भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७२ 407 यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राजद्वार के उत्तर की ओर लालरङ्ग से कपड़ों की रङ्गाई करने वालों के मोहल्ले या दुकानें होना ठीक है और काले रङ्ग से कपड़ों की रङ्गाई करने वालों के मोहल्ले व दुकानें दक्षिण दिशा में प्रशस्त मानी है। सफेद वस्त्रों के व्यापारियों के बाजार, मोहल्ले व दुकानें पूर्व दिशा में होना प्रशस्त कहा है, जिसे राजभवन के आगे की ओर कल्पित किया जाएगा। अष्टादशानां धान्यानां सर्वदिक्षु च विक्रयः। ताम्बूलानां च पूगानां विक्रयो देवताग्रतः ॥ ३९ ॥ नागरिकों के लिए अठारह प्रकार के धान्यों के क्रय-विक्रय की दूकानें नगर की सभी दिशाओं के बाजारों में, सर्वत्र होनी चाहिए। पान वालों या पनवाड़ियों- तम्बोलियों की दूकानें व सुपाड़ी बेचने वाले की दुकानें देवताओं के मन्दिरों के आगे लगे बाजारों में होनी चाहिए। ( तां )दलांक्ष ?¹ चित्रलेखाद्या गृहेषु पुरवासिनाम्। छिंपिका रजकास्त्रैणाः स्वदेवादिपुरे स्थिताः ॥ ४० ॥ पुरवासियों की सुविधा के लिए (तलारक्ष या लक्षकार-लखारे), चित्रकार- चितारे, छीपा, रजक-धोबी आदि की दुकानें उनके अपने-अपने (पुरे) मोहल्लों में ही उनके देवालयों सहित होनी चाहिए। वर्णादीनां निवेशनं - ब्राह्मणाः पूर्ववास्तव्याः क्षत्रियाश्चैव दक्षिणे। प्रशस्ताश्चोत्तरे शूद्रा वैश्या मध्ये च सङ्कुलाः ॥ ४१ ॥ नगर में चारों वर्ण के समाजों की बस्तियों की भी समुचित व्यवस्था होनी ही चाहिए जैसे- ब्राह्मणों की ब्रह्मपुरी राजभवन के पूर्व दिशा के नगर भाग में हो, क्षत्रियों की हवेलियाँ दक्षिण के नगर भाग में, शूद्रों के मोहल्ले उत्तर के भाग में बसाने चाहिए और वैश्यों के आवास नगर के भीड़ भरे मध्य भाग में निवेशित करने चाहिए। पुरे पुरे च विप्राक्ष क्षत्रिया वैश्यशूद्रकाः । तद् बाह्यतस्तथा चान्यास्तथा स्थपतिसङ्कुलाः ॥ ४२ ॥

  1. 'तलारक्ष' इति स्यात्। इस ग्रन्थ की रचना के समय तक नगरों में तलारक्ष का पद होता था। चीरवा के 1273 ई. के अभिलेख में तलारक्ष के रूप में योगराज के पुत्र पमराज का नाम आया है, योगराज का चौथा पुत्र क्षेम चित्तौड़दुर्ग का तलारक्ष था : श्रीपद्मसिंह भूपालयोगराजस्तलारताम्। नागह्रदपुरे प्राप्तपौर प्रीति प्रदायकः ॥ क्षेमस्तु निर्मितं क्षेमाश्चित्रकूटे तलारताम्। राज्ञः श्रीजैत्रसिंहस्य प्रासादादापदुत्तमात् ॥ (वियना ओरियण्टल जर्नल जिल्द 21, पृष्ठ 155-162 एवं एपिग्राफिया इण्डिका जिल्द 27, पृष्ठ 285-
  1. इसी शिलालेख में भुवनदेव का नाम भी आया है।