अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें406 अपराजितपृच्छा गन्धी- अत्तारों की दुकानें और गन्ध-मसालों की दुकानें, हाथी-दांत के कारीगर, चूड़ीगरों आदि की दुकानें, धान्यगृह अर्थात् अनाज, गेहूँ, तिलहन-दलहन आदि जिंसों के भण्डारों की व्यवस्था भी जरूरी है। वहाँ भी पहले बताई, वैसी ही जल आदि की व्यवस्था भी होनी चाहिए। ताम्बूलफलसङ्कीर्णं पुष्पमालादिसङ्कुलम्। राजद्वाराग्रतश्चैव यतः स्याच्च जनाकुलम्॥ ३४॥ इसी प्रकार राजद्वारों के आगे भी जहाँ लोगों की भीड़-भाड़ बनी रहती है, वहाँ भी पनवाड़ियों-तम्बोलियों की दुकानें, फल वाले, पुष्प-मालादि के लिए मालियों की दुकानों का सङ्कुल अर्थात् समूह रूप में विपणन केन्द्र होना चाहिए। मञ्जिष्ठरङ्गशोभाढ्यं नारिकेलसमाकुलम्। त्रिगणोपस्कराद्यं च राजद्वारोत्तरे शुभाः॥ ३५॥ इसी तरह राजद्वार के उत्तर की दिशा में में मञ्जिष्ठ या मंजिठे के रंग बनाने वाले रङ्गरेजों, नारियल के भण्डारों के व्यापारी तथा सांसारिक जीवन में धर्म, अर्थ और काम— त्रिगणों के काम में आने वाले पदार्थ, उपस्करों की दुकानों की व्यवस्था भी शुभ कही है। आयसोपस्करं सर्वं शस्त्रादि विविधं तथा। व्यजनच्छत्रमायूरं शाश्वतं दक्षिणे शुभम्॥ ३६॥ इसी तरह राजद्वार के दक्षिण की ओर के विपणन केन्द्र में लोहादि धातु के उपकरणों, वस्तुओं के व्यापारियों की दुकाने और सभी प्रकार के विविध शस्त्रादि के व्यापारियों की दुकानें— व्यजन, पङ्खे-बीजणे, छत्र, चामर, मक्खी-मच्छर हटाने की चँवरियाँ आदि के विक्रेताओं की स्थायी दुकानें बनी हुई शुभ होती हैं। ईशाने च वस्त्रहयं पट्टिनेत्रपट्टाद्यकम्। स्वल्पवस्त्राद्याग्रेय्यां च वस्त्रबन्धस्तदग्रतः॥ ३७॥ राजद्वार के ईशान कोण की ओर के विपणन केन्द्र में कपड़े के व्यापारियों या बजाजों की दुकानें और घोड़े के गजगाव-झूल, झीण आदि वस्त्र और काठी तथा लगाम, (पट्टिनेत्रपट्टदिकं) की दुकानों के व्यापारियों की स्थिति उचित है। राजद्वार के आग्नेय दिशा की ओर छोटे वस्त्रों की व्यापारियों तथा वस्त्रों की-बन्धनी के रङ्गरेज-बनारा आदि और दर्जी आदि की दुकानें होनी चाहिए। रक्तकाद्युत्तरे शस्तं कृष्णरङ्गादि दक्षिणे। पूर्वतः श्वेतवस्त्राद्यं राजवेश्माग्रकल्पितम्॥ ३८॥