अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७२ 405 इसी तरह शासन की ओर से और भी व्यवस्थाओं का वर्णन है। नगर के सीमान्त या दीवारों, परकोटों के पास, प्रतोली या पोलों-दरवाजों के पास, हट्टमार्गेयो- बाजारों के मार्गों के पास जगत्यन्ते- चबूतरी के अन्त में जलाशय बनाए जाने चाहिए और उन पर जलोत्थान के लिए घटिमाला¹ (रहट अथवा नेज-डोरी गिरगिड़ी) की व्यवस्था होनी चाहिए। तत्र मण्डपिकादीनां - क्रयवस्तुयुतौकश्च तदग्रे विक्रयादिकम्। यतश्चागम्यते लोकैर्वर्तते जनसङ्कुलम्॥ ३२ ॥ (अब व्यापार मण्डी की व्यवस्था के बारे में कहते हैं) जहाँ मण्डियों में क्रय वस्तु अर्थात् सामान के क्रय-विक्रय के निमित्त लोगों का आना-जाना लगा रहे और भीड़- भाड़ बनी रहती हो [वहाँ उपर्युक्त जलस्रोतादि के प्रबन्ध में कमी नहीं रहनी चाहिए]। स्वर्णकारं सुगन्धं च गन्धिकं च तृतीयकम्। दन्तकर्म धान्यगृहमेतत्कुर्यात्तु पूर्वतः॥ ३३ ॥ इसी तरह मण्डी की व्यवस्थाओं में स्वर्णकारों-सर्राफों की दुकानें, तथा
- उपनिषदों में रहट का वर्णन मिलता है, 906 ई. के आसपास हुए सिद्धर्षि ने 'उपमितिभावप्रपञ्चकथा' में रहट का वर्णन किया है तथा 10वीं सदी में ही जालोर में लिखित 'कुवलयमाला' में रहट का उल्लेख मिलता है, वहां जन्मचक्र को रहट के उपमान के साथ समझाया गया है। आद्य शङ्कराचार्य ने छान्दोग्योपनिषद के भाष्य और अज्ञानबोधिनी ग्रन्थ में 'घटीयन्त्रकूपे' लिखकर इस यन्त्र के आठवीं सदी में प्रचारित होने का सङ्केत दिया है। 'प्रबन्धचिन्तामणि' में अरघट्टघटीयन्त्र नाम से उल्लेख मिलता है। रहट का प्राचीनतम विवरण विनयपिटक पर समन्तपादिका टीका में उपलब्ध होता है, जबकि चुल्लवंग्ग में तुलम्, करकटकम्, चक्कवट्टकम् नाम से सिंचाई के यन्त्रों का सङ्केत मिलता है। दूसरी सदी में हुए विष्णु शर्मा ने 'पञ्चतन्त्र' तथा इसके प्राचीन पाठ 'तन्त्राख्यायिका' में भी रहट का वर्णन एक मेंढक व सांप के आख्यान के साथ हुआ है। बारहवीं में पूर्णभद्र द्वारा लिखित 'पञ्चाख्यानक' में भी रहट का जिक्र है, यह ग्रन्थ मेवाड़ में लोकप्रिय था और महाराणा उदयसिंह के शासनकाल में चित्तौड़ में इसकी प्रतिलिपि तैयार हुई थी। इसी प्रकार हर्षचरित, कादम्बरी में क्रमशः उद्घाटघटी, चूनम नाम से रहट का उपयोग हुआ है, ये मालवा-मेवाड़ में लोकप्रिय थे। 'विक्रमाङ्कदेवचरित' में 'घटियन्त्रगुणोपम' कहकर इसे उपमेय रूप में दर्शाया गया है। हलायुध के 'अभिधानरत्नमाला' में नहरों के पानी का उत्थान करने वाले एक साधन के रूप में रहट का उल्लेख किया गया है जिस पर शब्दकोशकार मोनियर विलियम ने अपना विश्लेषण प्रस्तुत किया है। मेवाड़ की सीमा पर मन्दसौर में यशोधर्मन के 510 ई. के अभिलेख में वहाँ खुदवाए गए कूप पर निरन्तर जलोत्थान के लिए प्रयुक्त यन्त्र के रूप में मालाकार जलयन्त्र का प्राचीनतम उल्लेख है जबकि रहट के साथ खेतों के दान का प्रथमतः उल्लेख वीरपुरा, उदयपुर के 1185ई. के ताम्रपत्र में है जिसमें गुजरात के भीमसिंह के सामन्त अमृतपाल द्वारा लसाड़िया गाँव में अरहट के साथ भूमिदान का अहद है। (कला की कालकथा : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू', रहट प्रकरण)