अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७२ 403 प्रतोली राजगेहाग्रे राजमार्गस्तदग्रतः । विस्तीर्णा विंशतिकरैर्द्विरष्टद्वादशाधमा ॥ २२ ॥ राजभवन के आगे बनी प्रतोली अर्थात् बड़ी पोल से जाने वाला राजमार्ग आगे से 20 गज चौड़ा हो तो ज्येष्ठ, 16 गज चौड़ा हो तो मध्यम और 12 गज चौड़ा हो तो कनिष्ठ कहा गया है। हट्टश्रेणिस्ततः कार्या षोडशांशेन मार्गतः । बलिकर्मसमस्तानां हट्टोपरि गृहोत्तमम् ॥ २३ ॥ इसके बाद, राजमार्ग पर दुकानों की कतारें बनानी चाहिए जो राजमार्ग के 16वें भाग की चौड़ाई जितनी सड़क से दूरी पर हों। इन हाटों अर्थात दुकानों के ऊपरी भागों पर समस्त कर्मों के लिए उत्तम गृहों (कार्यशालाएँ) को बनाएँ। विदिशासु पुरं कार्यं जगत्यस्त्रिगुणं शुभम्। युग्मगृहाश्च कर्त्तव्याः पक्षयोश्चैव सन्मुखाः ॥ २४ ॥ पुर अर्थात नगर की विदिशाओं में इससे भी अर्थात् सोलवें भाग की चौड़ाई से भी तीन गुणी चौड़ाई की शुभ जगती अर्थात् चबूतरियाँ बनाएँ जिनके दोनों पक्षों पर अर्थात आजू-बाजू पर, आमने-सामने युग्म भवन होने चाहिए। प्रासादस्य प्रमाणेन पादोनेनाथवोच्यते। प्रासादार्द्धात्तु कर्तव्या ज्येष्ठ-मध्य-कनिष्ठिकाः ॥ २५ ॥ प्रासाद अर्थात् भवन के प्रमाणानुसार उन्हें प्रासाद के प्रमाण के बराबर ज्येष्ठ, प्रासाद के प्रमाण के एक पाद कम अर्थात् पौन भाग मध्यम और प्रासाद प्रमाण का आधा कनिष्ठ को रखें। एकभौमा द्विभौमा वा शाला निर्गमभूषिता । मत्तवारणसंयुक्ता निर्गताश्चित्रशालिकाः ॥ २६ ॥ जगत्यग्रे वामनं स्याद् भिट्टं तद्भुवि संस्थितम् । महोत्सवे च वासन्ते कुर्याद्धिन्दोलकं त्विह ॥ २७ ॥ इन भवनों में भी एक मंजिला, दो मंजिला भवन और शाला निर्गम अर्थात रोस भी बनाएँ जिससे आने-जाने की सुविधा रहे। उस रोस पर छाया के लिए मत्तवारण भी बना हो अर्थात छज्जे हों। उन भवनों के बाहर की ओर चित्रशाला बनाएँ अर्थात् दीवारों पर चित्र बने हों।¹ जगती के आगे उससे लगी हुई छोटी भिट्ट अर्थात् भींत
- प्राचीन भवनों में ऐसे चित्र आज भी देखे जा सकते हैं। चित्तौड़ दुर्ग पर कुम्भा महल, जयमल-पत्ता की हवेलियों पर इस प्रकार का चित्राङ्कन कार्य अद्यावधि शेष है। नाथद्वारा में महुआगढ़, मोतीमहल आदि