अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंxlix लोकमङ्गलमूलमाह — 427 स्वस्थ देशलक्षणं — 428 दुर्भिक्षनिवारणोपाय — 431 महाराजनिवेशोनाम षट्सप्ततितमं सूत्रम्॥ 76॥ 435-442 उच्चरङ्गिका प्रमाणमाह — 435 अन्य गृहादीनां — 435 सभाष्टकवेदीनिर्णयो नाम सप्तसप्ततितमं सूत्रम्॥ 77॥ 443-447 सभा निर्माण प्रकारलक्षणञ्च — 443 नवांशानुसारेण सुन्दरीशालाः — 443 इत्यमनन्तर वेदीलक्षणं — 445 वर्णानुसारेण वेदीप्रमाणमाह — 445 कार्यानुसारेण वेदीप्रयोगमाह — 446 महाराजाधिकाराजो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम्॥ 78॥ 447-455 चक्रवर्त्यादीनां नृपकोटयः — 448 राज्योत्पत्तिमाह — 449 बृहत् शुश्रूषया मातायात् राज्ञो दिनचर्यायाः — 450 पौरुषोद्भव मातायात्क्रमाह — 452 स्त्रीणामङ्गोद्भवा मातायात्क्रमाह — 453 राजसभासदवर्णनं — 454 गजमातायात्क्रमाह — 454 गजशालाप्रमाणहस्तिलक्षणकमेकोनाशीतितमं सूत्रम्॥ 79॥ 456-467 दन्तिन्यादि षड्विधा गजशालाह — 457 अधुना भद्रादीनां चतुर्विधा गजलक्षणमाह — 458 मृगजातिलक्षणमाह — 461 मन्द्रजातिलक्षणमाह — 462 सङ्कीर्णजातिगजलक्षणमाह — 463 गजवननिरूपणमाह — 464 परस्पर वनस्थितिं — 465 परस्पर गजस्थितिं — 465 अश्वलक्षणशाला नामाशीतितमं सूत्रम्॥ 80॥ 467-473