अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंI अथाश्वोत्पत्तिदेशाः — 468 अथाश्वाश्चातुर्वर्ण्यमाह — 468 तथा चोच्छ्रयादीनां प्रमाणमाह — 470 अशुभाश्वलक्षणमाह — 470 अथाश्वशालालक्षणं — 471 तत्रैव कूरार्थपात्रलक्षणमाह — 471 अश्वशालाप्रमाणं — 472 राजालयसिंहासनछत्रप्रमाणमैकाशीतितमं सूत्रम् ॥ 81 ॥ 473-482 नृपस्य कोट्यानुसारेणनिर्माणमाह — 473 आरोहणमाह — 476 दण्डनायकादीनां भवनप्रमाणमाह — 476 अधुना तलविधानमाह — 476 इत्यमनन्तर सिंहद्वारानुक्रममाह — 477 तोरण प्रयोजनलक्षणञ्च — 478 इत्यमनन्तर आसनविधानमाह — 479 अधुना छत्रप्रमाणमाह — 480 राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥ 482-485 शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां — 483 अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह — 483 राजपदमकराक्षमाह — 483 सभाष्टकानुसारेण पुष्पकसिंहासनमाह — 484 दन्तिशालामाह — 484 एकत्रिपञ्चप्रतोली नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥ 485-490 प्रतोल्योच्छ्रयप्रमाणमाह — 485 तत्रैव विस्तारमाह — 486 प्रतोलीचतुष्टये मुखद्वारमाह — 486 पोलसमूहमाह — 487 तस्य प्रकारलक्षणमाह — 488 त्रिपोल्यलक्षणमाह — 489 पञ्चपोल्यलक्षणं — 489