भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीभुवनदेवाचार्योक्ता सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशापरनामधेया अपराजितपृच्छा गन्धमादनो नाम प्रथमं सूत्रम् ॥ १ ॥ अथ ग्रन्थस्य निर्बाधपरिसमाप्त्यर्थं परम्परानुमितश्रुतिबोधितकर्त्तव्यताकं स्वाभीष्ट गणाधीशादिदेवानामाशीर्वादस्वरूपं मङ्गलम् — अभीप्सितार्थसिद्धयर्थं पूजितो यः सुरैरपि। सर्वविघ्नच्छिददे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ १ ॥ अपने अभीष्टार्थ की सिद्धि के निमित्त देवगण जिनका पूजन करते हैं जो समस्त विघ्नों का उच्छेदन करने वाले हैं, उन गणाधिपति को नमस्कार है। चतुर्मुखमुखाम्भोजवनहंसवधूर्म्मम ( -र्म्म! ) । मानसे रमतां नित्यं सर्वशुक्ला सरस्वती ॥ २ ॥ चतुर्मुख ब्रह्माजी के मुखरूपी कमलों के वन को हंसवधू अर्थात् हंसिनी के समान अनुरागपूर्ण भाव से निहारती हुई, ब्रह्माजी के मन रूपी मानसरोवर में नित्य रमण करने वाली सर्वशुक्ला अर्थात् श्वेतपुष्प माला व वस्त्रों को धारण करने वाली निर्मल, उज्ज्वल सरस्वती को प्रणाम है। ग्रन्थार्थं गन्धमादनपर्वताश्रये प्रवर्तनमाह — अथ श्रीहिमान्तभागे पर्वते गन्धमादने। विचित्रशिखराकीर्णे चित्रस्फटिकशोभने ॥ ३ ॥ चन्द्रकान्तशिलारम्ये सेव्यामृतनिवासिने। सिद्धामरकन्याकीर्णे क्रीडामणिगुहागृहे ॥ ४ ॥ अब हिमाचल के अन्तिम भाग में विद्यमान गन्धमादन पर्वत का वर्णन किया जा रहा है जो अपने विचित्र शिखरों से युक्त, स्फटिक चित्र-सा शोभित होता है। वहाँ रमणीक चन्द्रकान्त शिला है जो कि देवताओं का निवास है। वहीं पर सिद्ध, देव-कन्याओं के निमित्त क्रीडामणि गुहागृह विद्यमान है।