भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 535 में से

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सूत्र- १ 3 इन पर्वत शिखरों से निकलकर बहने वाली नदियों के नाम हैं— गङ्गा, सरस्वती, पुण्यवती वेदका (वेदिका) मधुमती, पारा, सिन्धु, कावेरी, गोमती और चन्द्रतारका। मज्जन्मातङ्गगण्डच्युतमदमदिरामोदमत्तालिमालं स्नानैः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुङ्कुमासङ्गपिङ्गम्। सायं प्रातर्मुनीनां कुशकुसुमचयच्छिन्नतीरस्थनीरं पायान्नो गाङ्गमम्भः करिमकरकराकान्तरं हस्तरङ्गम्॥ 12॥ इन नदियों के जल में स्नान-मज्जन करने वाले मदमाते हाथियों के गण्डस्थल, कपोलों से बहने वाले हस्तिमद रूपी मदिरा के जल में घुलने से फैली सुगन्ध के मोद में मस्त भँवरों के झुण्ड चारों ओर सर्वत्र उड़ते दिखाई देते हैं। इसी प्रकार इन नदियों के प्रवाह के जल में सिद्ध और महात्माओं की रमणियों के स्नान करने से उनके कुच युगल अर्थात् दोनों स्तनों पर चिपके हुए कुङ्कुम-केसर के लाल रङ्ग के पानी में गलकर बहने से अपूर्व शोभा और सुगन्ध फैल रही है। इसके साथ ही मुनियों द्वारा अपने सायंकाल और प्रातःकाल के स्नान करते समय पूजा-अर्चना में प्रयुक्त कुश, कुसुमादि चयनित पुष्पों के नदियों के किनारे ठहरे हुए जल में एकत्रित हो जाने से वहाँ की वायु में अपूर्व सुरभि का वास मिलता है। गङ्गा नदी के जल में हाथियों के मस्ती में स्नान करने और मकर, सारस आदि जन्तुओं के तैरने और उछालने से जो अन्तरङ्ग जल राशि की उत्ताल तरङ्गे प्रसारित होती हैं, वे ऐसे लगती हैं मानो ओले वाली वर्षा हो। दंष्ट्रिगजेन्द्रवनजाः सिंहव्याघ्रगुहास्तथा। गण्डभल्लूकशार्दूलाः शूकरा महिषा मृगाः॥ 13॥ शुककोकिलकुलायै रम्भं शीशि(चीचि)रवोद्भवैः। वदन्त्येतैते (रे?) व गिरा तपोवननदीस्वराः॥ 14॥ इन विशाल वनों और पहाड़ों की उपत्यकाओं में जंगली हाथियों, गजेन्द्रों, सिंहों, व्याघ्रों को यहाँ की गुहाओं में बसे हुए देखा जा सकता है। इनके साथ ही यहाँ के वनों में गेण्डे, भालू, शार्दूल, शूकर, भैंसे, मृग, तोते, कोयलों के समूहों के गान और चहचहाहट से शिशिर अर्थात् ठण्ठ के मौसम का आभास होने लगता है। इन पशु-पक्षियों की वाणी व नदियों के बहने के स्वरों से यहाँ के तपोवन जीवन्त बने रहते हैं और बड़े ही आनन्दप्रद लगते हैं।¹

  1. उक्त श्लोकों में ग्रन्थ रचनाकार भुवनदेव की कल्पना ही नहीं, प्रासाद और माधुर्य शब्दशक्ति के प्रयोग के साथ-साथ साहित्य और अलङ्कारिक वर्णन की क्षमता परिलक्षित होती है।
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