भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

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सूत्र-८३ 487 अब मैं प्रतोली चतुष्टय के मुख-द्वारों के बारे में क्रम से निर्माण-विधि संक्षेप से कहता हूँ। उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः। प्रतिकाय इति प्रोक्तं प्रतोलीनां चतुष्टयम् ॥ 10 ॥ प्रतोली-चतुष्टय में एक द्वार उत्सङ्ग, दूसरा पूर्णबाहु, तीसरा हीनबाहु एवं चौथा प्रतिकाय संज्ञक होता है। उत्तरामुख उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च पूर्वतः। अपरे हीनबाहुश्च प्रतिकायस्तु दक्षिणे ॥ 11 ॥ इसमें उत्तरामुखी द्वार उत्संग होता है, पूर्णबाहु पूर्व दिशा सम्मत, हीनबाहु पश्चिमाभिमुख एवं प्रतिकाय दक्षिणाभिमुख होता है। सृष्टिप्रवेश उत्सङ्गः प्रतिकायोऽपसव्यतः। पूर्णबाहुः पूर्ववक्त्रो वामास्यो हीनबाहुकः ॥ 12 ॥ सृष्टि-प्रवेश (सृष्टिक्रम से) द्वार उत्सङ्ग कहा जाएगा, अपसव्य क्रम से प्रतिकाय होगा अर्थात् दायीं ओर होगा। पूर्णबाहु पूर्वमुख होता है और हीनबाहुक दक्षिणमुखी।¹ वामभागे दिशि दिशि वामावर्तोद्भवस्तु ये। द्वारं च दक्षिणावर्तं कथितं त्वपराजित ॥ 13 ॥ इसके वाम भाग या बायें भाग में प्रत्येक दिशा में आवर्त (परिक्रमणक) होते हैं। इनके द्वार दक्षिणावर्त होते हैं। हे अपराजित ! ऐसा कहा गया है। पोलसमूहमाह - एकपोल्यं त्रिपोल्यं वा पञ्चपोल्यमथोच्यते । एवंविधः प्रकर्तव्यः पोल्यानां तु समुच्चयः ॥ 14 ॥ अब पोल समूह के बारे में कहता हूँ। ये तीन प्रकार की होती है— एक पोल वाली, त्रिपोल्य या तीन पोल वाली तथा पञ्चपोल्य या पाँच पोल वाली।

  1. यह वर्णन समराङ्गण. में द्वार के प्रसंग में आया है-उत्सङ्गो हीनबाहुश्च पूर्णबाहुस्तथापरः। प्रत्यक्षायश्चतुर्थश्च निवेशः परिकीर्तितः ॥ उत्सङ्ग एवदीक्षाभ्यां (?) द्वाराणां वास्तुवेश्मनोः। स सौभाग्यप्रजावृद्धिधनधान्यजयप्रदः ॥ यत्र प्रवेशतो वास्तु गृहं भवति वामतः। तद्धीनबाहुकं वास्तु निन्दितं वास्तुचिन्तकैः ॥ तस्मिन् वसन्प्रव्यथितः स्वल्पमित्रोऽल्पबान्धवः । स्त्रीजितश्च भवेन्नित्यं विविधव्याधिपीडितः ॥ वास्तुप्रवेशतो यत् तु गृहं दक्षिणतो भवेत्। प्रदक्षिणप्रवेशत्वात् तद् विद्यात् पूर्णबाहुकम् ॥ तत्र पुत्रांश्च पौत्रांश्च धनधान्यसुखानि च। प्राप्नुवन्ति नरा नित्यं वसन्तो वास्तुनि ध्रुवम् ॥ गृहपृष्ठं समाश्रित्य वास्तुद्वारं यदा भवेत्। प्रत्यक्षायस्त्वसौ निन्द्यो वामावर्तप्रवेशवन् ॥ (समराङ्गण. 39, 11-17)
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