अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 533, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ें488 एकपोल्यं वक्त्रद्वारं त्रिपोल्यं भ्रमणीद्वयम्। पञ्चपोल्यं तु चित्राढ्यं कर्तव्यं सर्वकामदम्॥ 15 ॥ एक पोल का तो मुख्य द्वार एक ही होता है परन्तु त्रिपोलिया में दो भ्रमणी होती है तथा पञ्चपोल्य में तरह-तरह के चित्र अर्थात् मूर्ति अलङ्करणों की आढ्य- भरमार होनी चाहिए जो सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाली है। तस्य प्रकारलक्षणमाह — प्राकारादियुक्तभागैर्विस्तरो भागषट्कतः। निर्गमश्च चतुर्भागैः प्राकारो यत्र वाञ्छितः॥ 16 ॥ इन पोलों के प्राकार अर्थात् परकोटे भी समुचित भागों के विस्तार वाले होते हुए छह भाग तक होते हैं। जहाँ-जहाँ प्राकार-परकोटा वाञ्छित है, वहाँ-वहाँ उसका निकास-निर्गम चार भागों तक का होना चाहिए। याम्यपार्श्वे समस्तत्र विस्तरस्तु त्रिभागिकः₃। निर्गमश्च त्रिभागैश्च₃ सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 17 ॥ बायें भाग के समस्त अर्थात् बायीं बाजू के समस्त परकोटे तीन भाग के विस्तार-चौड़ाई वाले होने चाहिए। उनका निकास भी तीन भाग का होना चाहिए। ये सब मेरे द्वारा संक्षेप में कह दिया गया। अन्यदप्याह — त्रिभागं दक्षिणे त्यक्त्वा द्विभागं च तथोत्तरे। शेषा प्रतोली चैकांशा भागं दक्षिणभित्तिका॥ 18 ॥ तीन भाग दक्षिण की ओर छोड़कर तथा दो भाग उत्तर की ओर छोड़े; एक अंश-भाग प्रतोली की दक्षिणी भित्ति का होता है। भवेत् भागोत्तरा भित्तिः कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃। दक्षिणे भित्तिपार्श्वेऽग्रे कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃॥ 19 ॥ जो भाग उत्तर की ओर की भित्ति का होता है, उसके कोने तक तीन वलण (घूमाव) होते हैं तथा उसके दक्षिण की भित्ति के पार्श्व में भी आगे की ओर कोने तक तीन वलण होते हैं। द्विभागं विस्तरं कुर्याद् वक्त्रमार्गप्रवेशनम्। एकपोल्यमिति ख्यातं सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 20 ॥ द्वार के मुखमार्ग में प्रवेश करने के लिए दो भाग का विस्तार होना चाहिए। इस