अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-८३ 489 त्रिपोल्यलक्षणमाह — वामे द्विभागविस्तीर्णे अपरे दशभागिके₁₀ । दक्षिणे समभागश्च चतुर्भागं परे हितम् ॥ २१ ॥ इसी प्रकार बायीं ओर का विस्तार दो भाग का और दूसरी ओर दस भाग दक्षिण में भी उतने ही समान भाग का और परे-दूसरी ओर चार भाग रखना उचित है। त्रिभागे विस्तरं याम्ये अपरेऽस्य ¹समपदम् । याम्ये कुर्याच्च वेदांशं₄ मूलद्वारं तु कारयेत् ॥ २२ ॥ दक्षिण में तीन भाग के विस्तार का और अपरे-दूसरी ओर भी उतने ही समान पद अर्थात् तीन भाग का विस्तार हो तथा दक्षिण ओर का विस्तार चार भाग का हो, ऐसा मूलद्वार बनाना चाहिए। चतुर्भागाग्रभ्रमणं² भागा भित्तिर्याम्योत्तरे । भागा भित्तिस्तदग्रे च समद्वारं सतोरणम् ॥ २३ ॥ आगे की ओर चार भाग का भ्रमण अर्थात् घूमाव हो जिसके उत्तर दिशा और दक्षिण दिशा में भित्ति हो। उसके आगे की ओर भी एक भाग की भित्ति हो और तोरणयुक्त समान द्वार हो। पुनर्भ्रमश्चतुर्भागः षड्भागश्चैव विस्तरे । विधेयं पूर्ववच्छेषं त्रिपोल्यं नाम शोभनम् ॥ २४ ॥ उसके भी पुनः चार भाग का भ्रमण-घूमाव हो जिसका विस्तार छह भाग का हो, शेष सभी अङ्गों का न्यास पूर्व में बताए विधेय के अनुसार ही होगा। इस प्रकार के द्वार का नाम त्रिपोल्य अर्थात् त्रिपोलिया कहा है। पञ्चपोल्यलक्षणं — यथा वामे तथा दक्षे भित्तिर्भागा भुजान्ततः । मध्यभित्तिर्यथा पूर्वं चतुष्काकृति तोरणे ? ॥ २५ ॥ जैसा बायें वैसा ही दायें भित्तियों के भाग एक गज तक के हों। मध्य की भित्ति पूर्व की तरह की हो और चौकोर आकृति का तोरण हो (?)। द्वारं द्वारस्य सूत्रेण भागिको भित्तिविस्तरः । पुनरन्ते चान्तरे च द्वारं द्वारतृतीयकम् ॥ २६ ॥
- 'तमपदम् ?।' इति प्रकाशित पाठः ।
- 'चतुर्भागाग्ररमण' इति प्रकाशित पाठः ।