अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ सभी द्वार एक सीध में या सूत्र में बने हों जिनकी भित्ति का विस् हो और उनके पुनः अन्तर-अन्तर पर द्वार तीन-तीन की संख्या में तद्वत्तल्यानि क्षेत्राणि कार्याणि शोभनानि वै। पूर्वद्वारानुक्रमेण उभे द्वारे याम्योत्तरे ॥ 27 ॥ उनके अनुरूप ही शोभायुक्त तल क्षेत्रों की रचना करनी चाहिए। प के अनुक्रम में दोनों द्वार उत्तर दक्षिण में बनाने चाहिए। वक्त्रद्वारं पुनस्त्वेवं कर्तव्यं दक्षिणोत्तरे। पञ्चपोल्यमिदं ख्यातं प्राकारः कपिशीर्षतः ॥ 28 ॥ इसी प्रकार पुनः मुखद्वारों को भी दक्षिण-उत्तर की ओर बनाना र यह पञ्चपोल नामक द्वार उत्तम परकोटे और कपिशीर्ष-कँगूरों इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छ (एकत्रि) पञ्चप्रतोल्यधिकारो नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥ प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा पञ्चप्रतोली अधिकार नामक तियासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 83 ॥