अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
अ सभी द्वार एक सीध में या सूत्र में बने हों जिनकी भित्ति का विस् हो और उनके पुनः अन्तर-अन्तर पर द्वार तीन-तीन की संख्या में तद्वत्तल्यानि क्षेत्राणि कार्याणि शोभनानि वै। पूर्वद्वारानुक्रमेण उभे द्वारे याम्योत्तरे ॥ 27 ॥ उनके अनुरूप ही शोभायुक्त तल क्षेत्रों की रचना करनी चाहिए। प के अनुक्रम में दोनों द्वार उत्तर दक्षिण में बनाने चाहिए। वक्त्रद्वारं पुनस्त्वेवं कर्तव्यं दक्षिणोत्तरे। पञ्चपोल्यमिदं ख्यातं प्राकारः कपिशीर्षतः ॥ 28 ॥ इसी प्रकार पुनः मुखद्वारों को भी दक्षिण-उत्तर की ओर बनाना र यह पञ्चपोल नामक द्वार उत्तम परकोटे और कपिशीर्ष-कँगूरों इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छ (एकत्रि) पञ्चप्रतोल्यधिकारो नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥ प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा पञ्चप्रतोली अधिकार नामक तियासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 83 ॥