भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र- १ 9 ऐसी सुख मुद्रा में भगवान् विश्वकर्मा ज्ञानप्रदाता, मोक्षप्रदाता और विश्व के दुखों के निवारक और सृष्टिकर्ता के रूप में अनेकों कुतूहल, आश्चर्यजनक कार्यों को करते हुए विनोदपूर्वक, प्रसन्नचित्त से विराजित हैं। अथ विश्वकर्मनामपर्यायदीनां — विश्वकृद्विश्वकर्माणं त्वष्टारं देववर्धकिम्। भूर्भुवर्भुवनेशस्य स्वर्गदेवस्य विश्रुतम् ॥ 50 ॥ भगवान् विश्वकर्मा के अनेक नाम विश्रुत हैं। जैसे— विश्वकृत, विश्वकर्मा, त्वष्टा, देववर्द्धिकी, भूर्भुवः भुवनेश, स्वर्गदेव आदि।¹ पुनरुच्चार्य नामाथ प्रभाससूनुनन्दनम्। दण्डवत् प्रणतो भूत्वा जानुभ्यां धरणीतले ॥ 51 ॥ भक्तिमान् भो महाभूत पृच्छति त्वपराजितः । और भी, कहें तो वे प्रभावसुनन्दन हैं। अस्तु, इन परमप्रभु विश्वकर्मा को भूमि पर साष्टाङ्ग प्रणाम करके, दण्डवत् लेटकर, प्रणत होकर भक्तिभाव से अभिभूत होकर अपराजित उनसे प्रश्न करते हैं। अथापराजित प्रश्नं — समचित्तं च सम्बोध्य ह्यज्ञानां ज्ञानदो भवान् ॥ 52 ॥ सूत्रशास्त्रार्णवमध्यादुद्धृतं सारबीजकम्। सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं गुह्यं मध्यादुद्धरतो यथा ॥ 53 ॥ अपराजित बोले कि हे (महाभूत) प्रभु! आप मुझे समचित्त होकर सम्बोधित करके मेरे अज्ञान को हटाते हुए मुझे ज्ञान प्रदान करें जिससे मैं समस्त सूत्रशास्त्रों को, शिल्पज्ञान के शास्त्रों के महासागर के मध्य से अद्भुत सार बीज निकाल सकूँ जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर होने और गुह्य होने पर भी मैं उसका उद्धार करके समझ सकूँ। निशाकरे चास्तमिते उदिते च दिवाकरे। सूत्रार्थस्य प्रवक्तुवै ज्ञानं चक्षुः प्रकाशनम् ॥ 54 ॥


  1. तुलनीय : विश्वकर्म विमना आदिद्धाया धाता च विधाता परमोत संदृक्। तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषिन् पर एक माहुः ॥ (ऋग्वेद 10, 82, 2) देखें यास्क भाष्य : विश्वकर्मा विभूतमनाः व्याप्ता धाता च विधाता च परमः च संद्रष्टा भूतानां । तेषां इष्टानि वा। कान्तानि वा। गतानि वा। मतानिं वा। नतानि वा। अद्भिः समोदन्ते। यत्र एतानि सप्त ऋषीणि ज्योतींषि। तेभ्यः परः आदित्य। तानि एतस्मिन् एकं भवन्ति। इति आदि दैवतम् । (निरुक्त : यास्कभाष्य 10, 26)