अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें8 अपराजितपृच्छा· उक्त भवनों के पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में चारों ही ओर दिव्य तोरणों की शोभा है व उनके मध्य में दिव्य पर्यङ्क-शय्या सजी हुई है जिसे सिंह-व्याल आदि के चित्र-कौशल से अलङ्कृत किया हुआ है। इन पर्यङ्कों पर स्वच्छ, श्वेतवर्ण के मसनद (सिरहाने) रखे हुए हैं जो ऐसे दिखाई देते हैं मानो दो हंस वहाँ पर विराजित हों। तत्र भगवान् विश्वकर्माणवर्णनमाह — तत्रस्थं सुखमासीनं विश्वकर्ममहौजसम् ॥ 45 ॥ वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञं सर्वशास्त्रविशारदम् । सर्व विज्ञानवन्तं च सर्वज्ञं मानसागरम्¹ ॥ 46 ॥ (उन शिरोद्वारों के सहारे ही) वहाँ पर महाओजस् तेजस्वी भगवान विश्वकर्मा सुखासन अवस्था में विराजमान है। भगवान् विश्वकर्मा वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) एवं वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष एवं छन्द) और तत्त्व (कूटस्थ पुरुष, प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, हस्त, पाद, जिह्वा, लिङ्ग, गुह्याङ्ग, श्रवण, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण तथा मन²) के मर्मज्ञ और सर्वशास्त्रों के विशारद है, सर्वविज्ञानवन्त है और मानादि प्रमाणों के अगाध सिन्धुरूपेण ज्ञान के भी सर्वज्ञ है। चतुर्भुजं ब्रह्मतेजस्तप्तकाञ्चनसन्निभम् । दीप्तकुण्डलशोभाढ्यं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम् ॥ 47 ॥ अक्षसूत्रं वामहस्ते दक्षिणे तु कमण्डलुम् । पुस्तकं वामहस्तोर्ध्वे जपमाल्यां तु दक्षिणे ॥ 48 ॥ उनका तेजोमय स्वरूप चतुर्भुज हैं और ब्रह्मतेज से तप्त होकर तपाए गए स्वर्ण, हेमकुन्दन के समान जगमगाहट कर रहा है। उनके कानों में दीप्त कुण्डलों की शोभा वृद्धिस्पद है और उनके विशाल ललाट पर ज्ञान-चक्षु त्रिनेत्र और सिर पर चन्द्रमा का दिव्य दर्शन हैं। उनके वाम हाथ में अक्षसूत्र हैं और दक्षिणी हाथ में कमण्डलु है। इसी प्रकार उनके ऊपर के बाँये हाथ में (शिल्पविज्ञान की) पुस्तक और ऊपरी दायें हाथ में वे जपमाला को धारण किए हैं। ज्ञानदं मोक्षदं चैव विश्वहा सृष्टिकारकम् । तिष्ठन्तं च विनोदेन ह्यनेकँश्च कुतूहलैः ॥ 49 ॥
- यहाँ मानसागर से आशय रचनाकार के समय में प्रचलित कोई गणित-मपित ग्रन्थ भी हो सकता है।
- शुक्रनीति (4, 48); तुलनीय सांख्यदर्शन।