भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

7 सूत्र- १ प्रवेशनिर्गमोपेतं नरनारीजनाकुलम्। वे ध्वजादि किङ्किणियों से युक्त और अर्द्धचन्द्रों से विभूषित थे। वहाँ नाना कोणों वाले वितानों की निर्मितियाँ थीं जो चित्रपट्टादि से शोभित थीं। वहाँ प्रवेश और निर्गम मार्ग पर नर-नारियों के समूहों का आना-जाना लगा रहता था। तत्र सङ्गीतादीनामाह – महामुरजशब्दैश्च गीतैश्च विविधैः पुनः ॥ ३९ ॥ मनोहरं गृहं दिव्य देवानाम्पि दुर्लभम्। लास्यहास्यैश्च विविधाः क्रीडन्ते रुद्रकन्यकाः ॥ ४० ॥ देवकन्याश्च विविधा ऋषिनार्यस्तथोत्त्तमाः। सहिता नृत्यमानाश्च मङ्गलैः कौतुकैः सह ॥ ४१ ॥ महामृदङ्गों के निनाद के साथ नाना प्रकार के गीत मनोहर, दिव्य गृहों में गाए जा रहे थे जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ थे और उन गीत, वाद्यों के साथ कई रुद्र कन्याएँ अपने लास्य नृत्य और हास्य से विविध प्रकारेण क्रीड़ा कर रही थीं। वे आमोद-प्रमोद में तत्पर थीं। उक्त रुद्रकन्याओं के सङ्ग में विविध देवकन्याएँ तथा उत्तमोत्तम ऋषि नारियाँ, महिलाएँ भी माङ्गलिक कौतुकों के साथ नृत्य में उनका साथ दे रही थीं। त्रिसङ्गीतैश्च विविधैः प्रेक्षणीयं गणेश्वरैः। गणाः किलकिलायन्ति प्रवल्गन्ति मुहुर्मुहुः ॥ ४२ ॥ इधर, इस प्रकार नाच-गान की तरह ही त्रिसङ्गीत (गायन, वादन व नर्तन) के विविध प्रकारों से दर्शनीय गणेश्वरगण भी बारम्बार किलकिलाकर उछलते-कूदते हैं और हंसते हुए नृत्यादि में मग्न थे। भवनशोभावर्णनमाह – इदं च भुवनं नित्यं शुद्धस्फटिकसन्निभम्। वज्रवैडूर्यखचितं रत्नप्राकारशोभितम् ॥ ४३ ॥ इसी तरह वहाँ के भवनों की शोभा बहुत रमणीक प्रतीत होती थी। मानो वे शुद्ध स्फटिक से निर्मित हो। यह भी लगता था कि मानो उनकी सुन्दरता में उनमें हीरे, वैडूर्य, मणियाँ और नाना प्रकार के रत्नादि विजड़ित हों, ऐसी वहाँ की भित्तियाँ थीं। तोरणैर्दिव्यमाख्यातं पूर्वापरयाम्योत्तरम्। तन्मध्ये दिव्यपर्यङ्कं सिंहव्यालैरलङ्कृतम् ॥ ४४ ॥ हंसतुल्यं समारूढं शिरोद्धारद्वयान्वितम्।