भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 55

6 अपराजितपृच्छा के विविध जातियों के वृक्ष थे। जाति-चमेली के पुष्प, चम्पक, मन्दार, नीलकमल, रक्तकमल, कङ्कोल, लवङ्गादि, कर्पूर देने वाले पादप और बहुत ही फलों से लदी विविध प्रकार की लताएँ थीं। रक्तचन्दन के वृक्ष और बहुत से तृण-पादप थे। अगस्त्याम्बुरुहाशोकबिल्ववृक्षाः सचन्दनाः। नागकेसरपनसा द्राक्षाखर्जूरदाडिमाः ॥ ३२ ॥ शालतालतमालाश्च हिन्तालमधुपादपाः। कर्णिकारद्रुमा रम्या नानापुष्पफलान्विताः ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार अगस्त्य, अम्बु वृक्ष, अशोक, बिल्व के वृक्ष चन्दन सहित थे। नागकेसर, पनस, द्राक्षा, खर्जूर, दाड़िम, शाल, ताल, तमाल, हिन्ताल, मधुक के वृक्ष और कर्णिकार के रमणीय वृक्ष नाना पुष्पों और फलों से लकदक थे। चन्द्रकान्तकलाभूमिः क्वचिन्मरकतप्रभा। प्रवालकसमाम्या क्वचित्स्फटिकनिर्मला ॥ ३४ ॥ कर्पूरकुङ्कुमसमपुष्पप्रकरसङ्कुला। सधूपामोदबहुला कुङ्कुमैरिव सिञ्चिता ॥ ३५ ॥ वह भूमि चन्द्रमा के कलाओं-सी दीप्तिमान और कदाचित मरकत की प्रभा जैसी प्रतीति देती थी। वह प्रवालक के समान रम्य और कदाचित स्फटिक के समान मल रहित थी। वहाँ कर्पूर, कुङ्कुम के समान वर्ण वाले पुष्पों का पुञ्ज था और धूपादि से सदा आमोदित रहता था तथा कुङ्कुम की भाँति प्रभविष्णुता से सिञ्चित प्रतीत होता था। इत्येवं भवनं दिव्यं दशयोजन_{10} विस्तरम्। गवाक्षचन्द्रिकोपेतं वातायनसमन्वितम् ॥ ३६ ॥ वहाँ पर दिव्य भवन था जो दस योजन विस्तार लिए हुए था। वह भवन गवाक्ष, चन्द्रिका के साथ ही वातायनों से युक्त था। अभ्रंलिहैर्ध्वजैश्चित्रैश्चामरैश्च विभूषितम्। घण्टाकोटिनिनादाढ्यनैकवादित्रसङ्कुलम् ॥ ३७ ॥ वह मेघों तक समुन्नत ध्वज-पताका, चित्रादि से अलङ्कृत चामरों से युक्त था। वहाँ कोटि-कोटि घण्टाओं का निनाद होता था। नाना वाद्य वादकों का सङ्कुल वहाँ विद्यमान था। किङ्किणीरावणोपेतमर्धचन्द्रैर्विभूषितम्। वितानसाहस्रयुतं चित्रपट्टादिशोभितम् ॥ ३८ ॥