भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२ 11 किस प्रयोजन से विकास होता है और उसको कौन धारण करता है, धरती का आधार कौन है, आकाश किस प्रकार स्थित है, मेरू आदि पर्वत और कुलाचल शैल का आधार क्या है, यह भी कहें। किं धरित्र्याः प्रमाणं च सप्त,द्वीपा वसुन्धरा। समुद्राश्च कथं प्रोक्ता वनोपवनकाननम् ॥ 4 ॥ द्वीपद्वीपेषु क्षेत्राणां प्रमाणानि कथं विदुः । जम्बूद्वीपस्य मध्ये तु नवक्षेत्राणि, कानि च ॥ 5 ॥ सात द्वीपों को धारण करने वाली वसुन्धरा का प्रमाण क्या है, इस पर विद्यमान समुद्र, वन-उपवन, कानन, द्वीप, उपद्वीप के क्षेत्रों का प्रमाण भी कहें। इस जम्बूद्वीप के बीच कौन-कौन से नवद्वीप हैं, बताएँ। उत्तमं भारतं क्षेत्रं तत्प्रमाणं च ख्यातु मे। स्वेदाण्डोर्ध्वजरायुजो भूतग्रामः कथञ्चन ॥ 6 ॥ को धर्मः कुत्र क्षेत्रेषु रम्यकादौ वदेद्भगवान् । ये देशा भारते क्षेत्रे आश्रमा ग्रामसङ्ख्यया ॥ 7 ॥ इस उत्तम भारत क्षेत्र का प्रमाण क्या है, बताइए। स्वेदज, अण्डज, पिण्डज और जरायुज जैसे भूत प्राणियों के विषय में बताएँ। किस क्षेत्र का क्या धर्म है, कौन क्षेत्र रमणीय है, हे भगवान् ! आप बताएँ। इस देश की आश्रम व्यवस्था, ग्राम संख्या आदि को भी स्पष्ट करें। को धर्मः कुत्र देशे तु भरतक्षेत्रमध्यतः । कृतत्रेताद्वापरे तु चतुर्थे₄ वा कलौ युगे ॥ 8 ॥ युगान्ते च कथं धर्मो युगरूपानुदेवताः । धर्मः कृतयुगादीनां द्विजदेवयज्ञादयः ॥ 9 ॥ इस भरत क्षेत्र के बीच के किस देश का कौनसा धर्म है, कृतयुग, त्रेतायुग, द्वापर और चौथे कलियुग के विषय में, युगान्त के धर्म, युगानुरूप देवताओं और कृतयुगादि के धर्म, द्विज, देवयज्ञादि के विषय में भी कहें। कश्च धर्मः कथं कीर्त्तिर्द्विजदेवालयादितः । आलयः सर्वसत्त्वानां वेश्महर्म्यप्रसाधनम् ॥ 10 ॥ वास्तूत्पत्तिः कथं तात देवादेश्च निघण्टुकम्। एकपादादिकं वास्तु यावत्पदसहस्रकम् ॥ 11 ॥ हे तात ! इसी प्रकार धर्म के विषय में भी कहो और द्विजों की कीर्ति, देवालयों,