भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 535 में से

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12 अपराजितपृच्छा समस्त लोगों के लिए भवन, हवेलियों व प्रसाधनों, वास्तु की उत्पत्ति को भी कहो। इसी प्रकार निघण्टु और एक पद से लेकर हजार पद तक के वास्तु पद विन्यास को भी कहो। मर्मोपमर्मवंशाश्च रेखाषट्कसंख्यादिकम्। वज्रत्रिशूललाङ्गलं हस्तसूत्रादिपद्मकम् ॥ 12 ॥ बलिकर्मविधिं ब्रूहि वास्तुपादनिवासिनाम्। विद्यात् स्थानानि सर्वाणि प्रासादभवनादितः ॥ 13 ॥ इसी प्रकार मर्म, उपमर्म, वंश, रेखा षट्क, संख्याओं, वज्र, त्रिशूल, हल, हस्त सूत्रादि पद्मक, बलिकर्म की विधि भी कहो। वास्तुपदानुसार वहाँ न्यसित देवताओं के विषय में कहो और समस्त प्रासाद, भवनों के स्थानों के विषय में कथन करें। हस्तलक्षणमानं च देवतापादसम्भवम्। मानोन्मानप्रमाणं च सर्वकर्मादिकारणम् ॥ 14 ॥ सूत्रधारो हि जानीयाद्वर्णकं रुतमेव च। इसी क्रम में हस्त लक्षण, हस्तमान, हस्त के पदानुसार वहाँ के देवताओं, मान-उन्मान के प्रमाण और उनका समस्त कर्मों में उपयोग, सूत्रधार की परीक्षा, वर्णादि के विषय में भी कहें। भूपरीक्षां शल्योद्धारं कीलिकारोपणादिकम् ॥ 15 ॥ वर्णगन्धरसास्वादप्लवादिभूमिलक्षणम्। दीपवर्त्तिप्राग्विशुद्धिं दिशां च साधनादिकम् ॥ 16 ॥ भूमि की परीक्षा, शल्योद्धार, कीलिकारोपणादि के साथ ही वर्ण, गन्ध, रस, स्वाद, प्लवादि के अनुसार भूमि के लक्षण, दीये की बाती के अनुसार पूर्वादि दिशाओं का ज्ञान जिस विधि से सम्भव हो, उसको भी कहें। प्रस्तारक्रमसूत्रं च राजधान्याः पुरादिकम्। पुरग्रामनगराद्यं खेटं कूटं च कर्वटम् ॥ 17 ॥ पुरप्राकारपरिखाप्रतोलीमार्गगोपुरम्। वेश्मानि राजवेश्यामानि सभां शालां गजाश्वयोः ॥ 18 ॥ भवनादि के लिए प्रस्तार क्रमसूत्र, राजधानी योग्य पुरों के अतिरिक्त जनवास के उपयोगी पुर, ग्राम, नगर, खेट, कूट, कर्वट के विषय में कहें। पुर की चहारदिवारी, परिखा, प्रतोली, मार्ग, गोपुर, योग्य महल, राजभवन, सभा, अश्व- गजशालाओं के बारे में कथन करें।