भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-२ 13 सूत्रपातविधिं ज्ञात्वाऽऽयव्ययादेश्च लक्षणम् । ज्योतिषे केवलं ज्ञानं स्त्रीपुरुषादिलक्षणम् ॥ 19 ॥ निर्माण कार्य के लिए सूत्रपात की विधि और आय-व्ययादि के लक्षण, ज्योतिष, स्त्री-पुरुष लक्षणों के विषय में भी कहें। प्रासादप्रतिमालिङ्गःजगतीपीठमण्डपान् । प्रासादान् विविधाकारान् वैराज्यकुलसम्भवान् ॥ 20 ॥ अष्टजातिक्रमच्छन्दो देशानुरूपसूत्रणे। प्रासाद, प्रतिमा, लिङ्ग, जगती, पीठ, मण्डप, वैराज्यादि कुलों से बनने वाले नाना प्रकार के प्रसादों, आठ जाति के छन्द और देशानुरूप सूत्र-प्रमाण के विषय में भी कहने का कष्ट करें। रेखाश्च विविधास्तत्र प्रासादे शिखरे मताः ॥ 21 ॥ घण्टाकलशध्वजानां प्रमाणं सृष्टिसम्भवम् । प्रतिष्ठा सप्तधा ख्याता कूर्माद्या च ध्वजान्तगा ॥ 22 ॥ प्रासादों के शिखरों के लिए प्रयुक्त होने वाली नाना प्रकार की रेखाओं, शिखरोपयोगी घण्टा, कलश, ध्वजादि के निर्माण के प्रमाण, कूर्मादि सहित सात प्रकार की प्रतिष्ठा और ध्वजान्तगामी विधियाँ कहें। प्रासादे गर्भद्वारे च देवतानामनुक्रमः । द्वारदृष्टिपदस्थानं दिग्द्वारं च कथञ्चन ॥ 23 ॥ प्रासाद के गर्भद्वार और देवता नामानुक्रम, द्वार दृष्टि, पद स्थान, दिशाओं के द्वार के विषय में भी कहने की कृपा करें। द्वारलक्षणं प्रोक्तव्यं दारुकर्मरथारुहे (त्मके) । सिंहकर्णकपोतालीनिर्यूहच्छाद्यकं लुमम् ॥ 24 ॥ वितानानि विचित्राणि क्षिप्तान्युत्क्षिप्तकानिं च। पद्मकं नाभिच्छन्दं च सभामार्ग मन्दारकम् ॥ 25 ॥ इसके अतिरिक्त, द्वार के लक्षण, काष्ठादि के लक्षण, सिंहकर्ण, कपोताली, निर्यूह, छाद्यक, लुमा, वितान, चित्र-विचित्र क्षिप्त-अनुक्षिप्त, पद्मक, नाभिच्छन्द, सभा, मार्ग, मन्दारक आदि के विषय में भी बताएँ। प्रतिमालक्ष्मस्थानानि दृष्टिस्थानादिकं तथा। भृत्यचारप्रभेदाश्च स्वस्वयानादिकं तथा ॥ 26 ॥