अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें14 अपराजितपृच्छा प्रतिमा, लाञ्छन के स्थान, दृष्टिस्थानादि, सेवकाचार के भेद और उनके यानादि, वाहनों के विषयों में भी कहें। तालप्रस्तारगीताद्यं वादित्रैः स्याच्चतुर्विधम्। चित्रपट्टप्रभेदाश्च रेखाचित्रसमुद्भवाः ॥ 27 ॥ इसी प्रकार सङ्गीत में ताल, प्रस्तार छन्द, गीतादि, चार प्रकार के वाद्यों (तत्, सुषिर, घन, आबद्ध), चित्रपट्ट के भेद, रेखाचित्रों के बनने की विधि कहें। वर्णरूपरसवृत्तिभावानुभावकोद्भवाः। शुद्धाबबद्धानि चित्राणि पत्राणि पञ्च एव च ॥ 28 ॥ शालभञ्जी प्रतांचारी लास्यताण्डवकादिकम्। वर्ण, रूप, रस, वृत्ति, भाव, अनुभाव से बनने वाले, शुद्ध, आबद्ध चित्रों, पाँच पत्रों, शालभञ्जिका, नृत्य में चारी, लास्य, ताण्डवादि नृत्यों के विषय में कहें। भूषणानि विचित्राणि देवासुरनृणां किल ॥ 29 ॥ छत्रं सिंहासनं शय्यां यानानि चायुधानि च। वेदिकानामलङ्कारं रत्नधातूद्भवं तथा ॥ 30 ॥ देवताओं, असुरों और मनुष्यों के नाना आभूषणों, छत्र, सिंहासन, शय्या, यान- विमान, आयुध, वेदिका, अलङ्कार, रत्नों-धातुओं की उत्पत्ति के विषय में कहें। एतत्सर्वं प्रसादेन कथय स्वयमीश्वर। भक्तवत्सल देव त्वं प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ 31 ॥ हे स्वयं ईश्वर! भक्त वत्सल देव!! उक्त समस्त विषयों के विषय में आप प्रभु! मेरे प्रति कहने का अनुग्रह करें। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सूत्रलक्षणाधिकारो नाम द्वितीयं सूत्रम् ॥ 2 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सूत्र लक्षण अधिकार नामक द्वितीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 2 ॥ ब्रह्माण्डोत्पत्तिर्नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ 3 ॥ विश्वकर्मोवाच — शृणु वत्स प्रयत्नेन यत्त्वया परिपृच्छितम्। कथयामि न सन्देहस्तव भ्रान्तिहरं च तत् ॥ 1 ॥