भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 64, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 64

सूत्र- ३ 15 (अपराजित के प्रश्न करने पर) विश्वकर्मा बोले— सुनो पुत्र! तुमने परिश्रम से जो-जो प्रश्न किए हैं, मैं तुम्हारा सन्देह और भ्रान्ति दूर करने को कहता हूँ। ब्रह्माण्डोत्पत्ति वर्णनमाह — पूर्वं ब्रह्माण्डमुत्पन्नं संसाराधारकं च तत्।¹ ततस्तस्मिन् समस्तं च जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥ २ ॥ पहले ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति हुई और संसार को धारण करने वाले की उत्पत्ति हुई। इसके बाद उस पर समस्त स्थावर, जङ्गम जगत की उद्भावना हुई। आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं ब्रह्मज्ञानादिकोद्भवम्। तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि च साम्प्रतम् ॥ ३ ॥² आदिकाल में सृष्टि किस रीति से उत्पन्न हुई, वैसे ही किस प्रकार ब्रह्मज्ञान का उद्भव हुआ, ऐसी ही समस्त युक्तियों का मैं यहाँ अब कथन कर रहा हूँ। नैव भूर्वायुराकाशं नैव चन्द्रार्कतारकम्। देवासुरमनुष्याणां नोत्पत्तिं प्रलये विदुः ॥ ४ ॥³ पूर्वकाल में न तो पृथ्वी थी, न वायु न ही आकाश था, न चन्द्रमा था, न सूर्य और न ही तारागणादि थे। इसी प्रकार न तो देवता थे, न असुर; मनुष्यों की उत्पत्ति भी नहीं हुई थी, ऐसा विद्वज्जन कहते हैं। न पृथ्वी सागरा द्वीपाः शैला मेर्वादयस्तथा। भूतग्रामः समस्त्वेवं स्वेदाण्डोड्भिज्जरायुजाः ॥ ५ ॥⁴ तब पृथ्वी पर न सागर थे न द्वीप और न ही मेरु आदि पर्वत ही थे। इसी प्रकार न कोई ग्रामादि बस्ती थी। इसके बाद, यहाँ समस्त स्वेदज (पसीने से उत्पन्न होने वाले जीव), अण्डज (अण्डों से पैदा होने वाले जीव), जरायुज (जर से उत्पन्न होने वाले जीव) पैदा हुए। अन्ये च बहवो जीवाः कीटसर्पपतत्रिणः। चतुरशीति लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ ६ ॥⁵

  1. पूर्वं ब्रह्माण्डोत्पत्ति संसारोधारकोद्भवं इति पाठः ।
  2. आद्योद्भवसृष्टिसूत्रं (स्तत्र) ब्रह्माण्डादिकटोद्भवम् ( ?)। तस्यायुक्ति अनुक्रमेण कथयामि च साम्प्रतमिति पाठः।
  3. न च भूमि चराकाशान् चन्द्रादितारकान् च। देवासुरमनुष्याणां तस्योत्पत्ति प्रलायाम्बिभू इति पाठः ।
  4. न च पृथ्वी सागरोविद्व पमेवीदि शिलोद्भवन् । भूतग्रामोग्राममस्त्व वंस्वेत जाण्डद्विजा रज इति पाठः ।
  5. अन्येषां बहवोजीवाकीट सर्पपतङ्गादयः । चतुराशी तीगणांनि जीवयोनि अनेकधा इति पाठः ।