भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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16 अपराजितपृच्छा इसी प्रकार कीट, सर्प, पतङ्गादि बहुत प्रकार के जीव हुए— कुल चौरासी लाख जीव योनियाँ कही गई हैं। सृष्ट्यनन्तरे सम्भूताः सर्वे जीवानुरूपकाः। सृष्टिस्तत्र यथान्यायं कथ्यते च यथाक्रमम्॥ ७॥ सृष्टि निर्माण के अनन्तर समस्त जीवरूपों की उत्पत्ति हुई, इस सृष्टि के विषय में जैसा न्याय में कहा गया है, मैं यथाक्रम कहता हूँ। कल्पान्तसम्भवा सृष्टिः संसारसृष्टिसञ्जिता। मन्वन्तरमनुकान्तं युगान्तं चैव यादृशम्॥ ८॥¹ कल्प के अन्त में सृष्टि की उत्पत्ति हुई जिसको संसार नाम से कहा गया है। इस मन्वन्तर के क्रम से, युगान्त की क्रिया को मैं कहता हूँ। वर्षान्ते भावरूपाश्च ऋत्वन्ते तामसोद्भवः। पक्षान्ते च सिताः कृष्णा दिनान्ते शर्वरी यथा॥ ९॥² यहाँ वर्ष के अनन्तर (प्रकृति के) भावरूप ऋतुओं, (उजाले व) अन्धेरे की उत्पत्ति हुई। पक्ष में शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष हुए और दिन के साथ ही रात्रि आदि हुए। एतद् दृष्ट्वा विशेषेण कल्पान्त एवमुद्भवः। कल्पे कल्पे पुनः सृष्टिर्जगत्स्थावरजङ्गमम्॥ १०॥ इस प्रकार अनेक विशेषताओं के साथ कल्पान्त में रचना होती है। प्रत्येक कल्प के अन्त में पुनः पुनः स्थावर-जङ्गम वाली जगत सृष्टि होती है। अपराजित उवाच — आदिसृष्ट्युद्भवो देव ब्रह्माण्डादिसमुद्भवः। ब्रह्माण्डं कथमुत्पन्नं कथं च द्वीपशैलयोः॥ ११॥ ब्रह्मा विष्णुः शशी सूर्य इन्द्रः स्कन्दो हुताशनः। नैव भूर्वायुराकाशं न देवासुरमानुषाः॥ १२॥ वेदोद्भवा च या सृष्टिः कर्म चैव सनातनम्। अस्माकं भक्तियुक्तानां कथयस्व परेश्वर॥ १३॥ अपराजित बोले— हे परमेश्वर! मैं भक्तिपूर्वक आपसे निवेदन करता हूँ कि मुझे आदिकाल में सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई; ब्रह्माण्डादि का उद्भव कैसे हुआ और इस ब्रह्माण्ड

  1. कल्पान्तोद्भवासृष्टी संसारासृष्टीकोद्भवा। मन्तरस्तनुक्रान्ता युगान्तामेव यादृशी इति पाठः।
  2. वर्षान्तो भावरूपाश्चरित्त्वर्तो मासोद्भवा। पक्षान्त शित कृष्णादि दिनान्ते शर्वशा यथा इति पाठः।