भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 535 में से

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पृष्ठ 66

सूत्र- ३ 17 में कैसे द्वीप-पर्वतादि उत्पन्न हुए; कैसे ब्रह्मा, विष्णु, चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र, स्कन्द, अग्नि हुए? तब न तो भूमि थी, न वायु न ही आकाश और देव-असुर और मानव ही थे फिर वेदोद्भावा यह सृष्टि कैसे सनातनतः कर्म वाली हुई, कृपया इस विषय को कहिए। विश्वकर्मोवाच — अनादेरादिसम्भूतादन्धकारोद्भवं तमः। आदौ तथान्धतमसं निराधारं निरन्तरम्॥ 14 ॥¹ अनादि काल में यह सृष्टि उत्पन्न हुई। लय के बाद जब इसकी उत्पत्ति हुई तब अन्धकार ही था, अन्य कोई नहीं। आदिकाल में यह अन्धकार ही था जो निराधार और निरन्तर था। निराकारादकारश्च अकारादम्भउद्भवः। अम्भसो रूपमाख्यातमम्बुदो रूक्षसुदूर्ध्वतः ? ॥ 15 ॥² उस काल में निराकारादकार से ही आकाराद का उद्भव हुआ था। तब जलार्णव से रूप सम्भूत रूप हुआ जो रूक्षरूप (जलाण्ड या बुलबुला) में उठा हुआ था। अव्यक्ताद् व्यक्तमापन्नमवर्णे वर्णतां विदुः। व्यक्ताख्यं वर्णरूपं च फेनस्थानसमुत्थितम्॥ 16 ॥³ उक्त अव्यक्त से व्यक्त बुद्बुद अवर्णवत् हुआ, जैसा कि मनीषियों ने वर्णन किया है, वह बाद में व्यक्त नाम से वर्णरूप हुआ और फेन के स्थान पर उठा हुआ दिखाई देता था। फेनवर्णे निबद्धं च ह्यण्डके रूपमाश्रितम्। शनैः शनैः प्रवर्द्धन्ते लोलकाकाररूपिणः॥ 17 ॥⁴ वह अण्ड फेन के ही वर्ण से निबद्ध होने लगा और रूपाश्रित होने लगा। धीरे-धीरे वह बड़ा होने लगा और दोलायमान रूप में आया। वृद्धेर्वृद्धिः पुनस्त्वेवं शनैश्चापि महोद्भवः। महोद्भवो महावृद्धिः शनैश्चापि विवर्द्धते॥ 18 ॥⁵


  1. अनाद्यानादि सम्भूता तमध्वजान्धकोद्भवा। यदा अन्धतमन्धश्च निरन्धाश्च निरन्तरा इति पाठः।
  2. निरन्धारे अकारेश्च अंकारेशुं भुकोद्भवा। अम्भोद्बवरूपाख्याता आशुकोद् इत उर्ध्वत इति पाठः।
  3. अव्यक्ताव्यक्तोपमानां अवर्णे वर्णित विभु। वर्णरूपं व्यक्ताकारं च फनस्थाने च सम्भवम् इति पाठः।
  4. फवर्णैन विबन्धश्च अण्डकं रुपमा स्थितः। शनैशनै प्रवर्द्धन्तो गोलाकाररुपिणः इति पाठः।
  5. वृद्धि पुस्त्यं शतैश्चापि महोद्भवम्। वृद्धीते महतोद्भग विअधोदे पृष्ठमावृत्तमिति पाठः।