भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 67

18 अपराजितपृच्छा ज्यों-ज्यों समय बीता, वह वृद्धि को प्राप्त होता रहा और महारूपवान् होता चला गया। महोद्भव के साथ-साथ वह महावृद्धि को प्राप्त हुआ अर्थात् विशालकाय होता चला गया। क्रमसंवर्धनात्त्वेवं विकाशं प्राप्त सर्वथा। वर्धते च महाभावर्ब्रह्माण्डं पृथुतां गतम् ॥ 19 ॥ वह क्रमशः बढ़ता हुआ, विकास को प्राप्त हुआ अपने महाभाव में ब्रह्माण्ड तुल्य पृथुता की गति को पाने लगा। अण्डव्यासपृथुमानं योजनैः शतकोटिभिः। सुनिष्पन्नाण्डकं यातं विकाशं वै द्विधा स्थितम् ॥ 20 ॥¹ धीरे-धीरे उस अण्ड का व्यास और विस्तार का मान योजन से शतकोटि तक होता चला गया। वह इससे भी दोहरे विकास को प्राप्त होता हुआ, अर्णव पर स्थित था। अर्धस्योर्ध्वं तथाकाशमर्धस्याधस्तु मेदिनी। तन्मध्ये वै समस्तं च येषां शम्भुकोद्भवत् ? ॥ 21 ॥ उसी अण्ड के ऊपरी स्वरूप से आकाश और नीचे के स्वरूप से पृथ्वी की रचना हुई। इसके बीच समस्त चराचर था जो कि शम्भू से उत्पन्न हुआ था। स्वर्गलोकार्णवद्वीपाः शैलाः शम्भुसमुद्भवाः। वनोपवनकाननं यथा रचितसम्भवम् ॥ 22 ॥ इसके साथ ही शिव ने स्वर्गलोक, समुद्र, द्वीप, पर्वत, वनोपवन, कानन आदि की रचना की। महामेरूद्भवमध्ये रचितं शम्भुकोद्भवम्।² तस्योर्ध्वे तु परं देवं संसारसृष्टिकारणम् ॥ 23 ॥ इसी प्रकार पृथ्वी पर महामेरु की रचना हुई, यह शम्भू द्वारा रचित हुआ। उसके ऊपर ही देव ने सांसारिक सृष्टि की। एकविंशति₂₁ स्वर्गांश्च मेरुव्यङ्गसमुद्भवाः ?। ³शम्भूद्गवाः क्रमेणैव पात्रे पात्रमिवापरम् ॥ 24 ॥

  1. कस्याण्डकष्ट गमनं योजनै शतकोटिभिः। सुष्यैन्निश्नन्तऽकं जातं विकाशंवैद्विधास्थितमिति पाठः।
  2. महामेरूद्भवं मध्ये अपरचि सम्भूद्भवा इति पाठः।
  3. महामेरूद्भवं मध्ये योगे पात्रेपात्रभिवातपरमिति पाठः।
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक) · पृष्ठ 67, कुल 535 में से · BharatKosha