भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

सूत्र- ३ 19 इसी प्रकार शिव ने इक्कीस स्वर्गों की रचना की और मेरु सहित अन्य अङ्गों को उत्पन्न किया। ये लोक क्रमशः एक पात्र के ऊपर रखे अन्य पात्र की भाँति स्थित हैं। पातालं समधा₇ ख्यातं सप्तद्वीपा₇ वसुन्धरा।¹ सप्त₇लोकास्तथा चोर्ध्वं स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ २५ ॥ इसी तरह सात पाताल² और सात प्रसिद्ध द्वीपों³ वाली वसुन्धरा की रचना की। इसमें सात लोक⁴ और ऊपर इक्कीस स्वर्गलोकों की रचना की। ततः सरांसि प्रतिमा जलस्य तु यानिकाः। पुष्पावाटी प्राकारो शाला द्विनयमुपवनं वेदिकान्त ध्वजा ? ॥ २६ ॥ इसके बाद, सरों, तालाबों, जलाशयों का स्वरूप (प्रतिमा) बना। साथ ही उनमें तैरने वाले यानों (नौका, जहाजादि) की रचना हुई। इसी प्रकार पुष्पवाटिकाएँ अपना आकार ग्रहण करने लगीं और, परकोटा, शालाएँ बनने लगीं। इसी प्रकार विनय, उपवनयुक्त वेदिकाओं (चबूतरों) पर ध्वजाएँ फहराने लगीं। शालकल्पद्रुमाणां ⁵परिवर्ति वनान्तदूर्प⁶हर्म्या ? । वली च पातालस्फटिकोपेतं वृसुरमुनिसुरा पीठिकार्गस्वर्गभूः ? ॥ २७ ॥ इसी प्रकार शाल जैसे विशाल कल्पद्रुमों के ऊपर की ओर हर्म्यावली अर्थात् हवेलियों की पङ्क्तियुक्त भवनों की कतार जो अपने ऊपर तल से लेकर ऊपर तक स्फटिक से ही निर्मित थी। यह वसुओं, मुनियों, सुरों, देवताओं की पीठिका आवास रूपी स्वर्गभूमि जैसी प्रतीत होती थी। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां ब्रह्माण्डोत्पत्त्यधिकारो नाम तृतीयं सूत्रम् ॥ ३ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति अधिकार नामक तृतीय सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ३ ॥

  1. पातालासप्तमाख्याता सप्तद्वीपा वसुन्धरा। सप्तलोकोर्द्धमाख्याता स्वर्गाणां चैकविंशति इति पाठः।
  2. अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम्। महातलं च पातालं रसातलमधस्ततः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण ब्रह्मखण्ड 7, 13)
  3. जम्बू, शाल्मलि, क्रौञ्च, कुश, शाक, पुष्कर तथा प्लक्ष द्वीप।
  4. भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक व सत्य या ब्रह्मलोक।
  5. 'परिवर्ति' प्रकाशित पाठः।
  6. 'हर्म्या' स्यात्।