भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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20 अपराजितपृच्छा पातालद्वीपार्णवसूत्रणं (सूचनं) चतुर्थ सूत्रम् ॥ 4 ॥ अपराजित उवाच - काचिच्छम्भूद्भवा सृष्टिः काचिद्देवांशसम्भवा । काचित्सृष्टिसमुद्भूता काचित्तद्वरदानतः ॥ 1 ॥ केचिच्छम्भूद्भवा वर्णा वनादीनां क्व चोदयः । निशासृष्ट्युद्भवाः केचिद् वनोपवनकाननम् ॥ 2 ॥ अपराजित बोले— हे प्रभु! यह बताइएगा कि कौनसी सृष्टि शम्भु के द्वारा और कौनसी देवांश द्वारा सम्भूत हुई है? कौनसी सृष्टि स्वयं हुई और कौनसी सृष्टि वरदान से हुई? इसी प्रकार शम्भु से कितने वर्ण उत्पन्न हुए और वनादिकों की उत्पत्ति कैसे हुई तथा कोई वन, उपवन और कानन निशाचरों, राक्षसों व पिशाचों द्वारा भी कैसे उत्पन्न किए गए हैं? अथ पातालद्वीपार्णवसूत्राणं विश्वकर्मोवाच — शम्भुजा भूधरा लोकाः पातालतलवासिनः । तथै (त्रै) सागरद्वीपाः शम्भुना रचिताः पुरा ॥ 3 ॥ पातालः सप्तधा त्वेवं ब्रह्मभागव्यवस्थितः । सप्तद्वीपाः समुद्राश्च आख्याता विष्णुसम्भवाः ॥ 4 ॥ विश्वकर्मा बोले— इस लोक में समस्त भूधर अर्थात् पहाड़ शम्भु द्वारा ही उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार समस्त पाताल तल के निवासी और समस्त सागरों के द्वीप भी शम्भु द्वारा ही पूर्वकाल में रचित है। पहले के समय में पातालों के सात भाग स्वयं ब्रह्मा द्वारा व्यवस्थित किए गए थे और सातों समुद्रों के सातों विख्यात द्वीपों की रचना भगवान विष्णु द्वारा की गई। रुद्रभागोद्भवालोकादीनां — सप्तोर्ध्वलोकाश्च, ख्याता रुद्रभागसमुद्भवाः । स्वर्गश्च मर्त्यपातालौ स्वर्गाणां त्वेकविंशतिः₂₁ ॥ 5 ॥ इसी प्रकार सात ऊर्ध्वलोक जो विख्यात हैं, उनको स्वयं भगवान रुद्र ने ही उत्पन्न किया। इस प्रकार से देखने पर हम पाते हैं कि स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताल लोकादि स्वर्गों की संख्या इक्कीस है। पातालः स्वर्ग आख्यातो मर्त्यो द्वीपार्णवात्मकः । स्वर्गश्च लोक आख्यातस्त्रैलोक्यं नाम प्रोच्यते ॥ 6 ॥