अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-५ 25 अथाङ्गुलात्योजनप्रमाणम् — वेदयुग्माङ्गुलैर्हस्तो दण्डो वेदकरैर्मतः। द्विसहस्रदण्डैः क्रोशो योजनं वेदक्रोशकैः ॥ ३५ ॥ (वेदयुग्माङ्गुलैर्हस्तो अर्थात्) चौबीस अङ्गुल के गज से और चार गज के दण्ड के नाप से बने दो हजार दण्डों से एक क्रोश बनता है और ऐसे चार क्रोश से एक योजन होता है। यह सब अङ्गुल से क्रमानुसार योजन तक का प्रमाण जानना चाहिए। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां पातालद्वीपार्णव सूत्रणा (संचरा)धिकारो नाम चतुर्थ सूत्रम् ॥ ४ ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में पातालद्वीपार्णव सूत्र (संचर) अधिकार नामक चतुर्थ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ ४ ॥ सप्तोर्ध्वलोको नाम पञ्चमं सूत्रम् ॥ ५॥ अपराजित उवाच — पातालमर्त्यलोकौ च कथितौ हि प्रमाणतः। स्वर्गान्कथत मे तात प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥ १ ॥ अपराजित बोले— पाताल, मर्त्यलोक और स्वर्गों के बारे में हे प्रभु! आप प्रमाणतः बताने की कृपा करें और मुझ पर अनुग्रह करें। अथ सप्तोर्ध्वलोकवर्णनं विश्वकर्मोवाच — जम्बू त ऊर्ध्वमाख्याता स्वर्गलोकाश्च सप्तधा। सप्तैते कथिताः स्वर्गा देवानामालयाः स्मृताः ॥ २ ॥ विश्वकर्मा बोले— जम्बूद्वीप से ऊपर की ओर सात प्रकार के स्वर्गलोक विख्यात हैं। ये सातों ही कहे गए स्वर्गदेवताओं के रहने के आवास माने जाते हैं। संस्थिताः क्रमयोगेन पात्रे पात्रमिवापरम्। सृष्टिः शम्भूद्भवा स्वर्गः कथ्यते तव साम्प्रतम् ॥ ३ ॥ ये सभी एक पात्र के ऊपर रखे हुए पात्र के उपरोपर रखे समान स्थित हैं। अब मैं इन सृष्टि में उद्भूत स्वर्गों के विषय में कहता हूँ। भुवर्लोकश्च स्वर्लोको महोलोकश्च तत्परम्। तुरीयो जनलोकश्च तपोलोकश्च पञ्चमः ॥ ४ ॥