अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें26 अपराजितपृच्छा सत्यलोकः सत्यगामी ज्ञानलोकोऽत्र सप्तमः ॥ विना विरचिताः शश्त्रै ? र्लोका वै शम्भुसम्भवाः ॥ ५ ॥ इनमें से पहला भुवर्लोक है, फिर स्वर्लोक, तीसरा महर्लोक उससे भी ऊपर है। चौथा जनलोक और पाँचवाँ तपःलोक है। छठवाँ सत्यलोक है जहाँ सत्यानुगामी पहुँचते हैं। सातवाँ ज्ञानलोक है। ये सब बिना ही विरचित सातों ही लोक शम्भू या स्वयम्भू सम्भव हुए हैं। तदूर्ध्वं मेरुराख्यात एकविंशदिवाधिपः₂₁। ब्रह्माण्डमध्ये मेरुर्वै त्रैलोक्यस्तम्भकः स्मृतः ॥ ६ ॥ निर्गन्थाः कल्पदेव्यः परिचिता देवतात्मकाः । प्रद्योतकं समस्तं तज्जगदाल्हादकारकम् ॥ ७ ॥ उसके ऊपर इक्कीस स्वर्गों का अधिपति मेरु विख्यात है जो एक प्रकाश के ब्रह्माण्ड का मध्य स्तम्भ मेरु होकर तीनों ही लोकों का स्तम्भ माना जाता है। वह निर्गन्था कल्पदेव परिचित देवात्मा होकर प्रभविष्णुमय है और समस्त जगत को आनन्द देने वाला है। स्वर्गे चाग्रिः ? ( चाग्र ) स्थिता देवास्तेषां पृथ्व्युद्भवाः । सप्त चिन्तात्मका लोकाः संसारहितकाम्यया ॥ ८ ॥ स्वर्ग में आगे जो देव हैं, उनमें जो देव पृथ्वी पर उत्पन्न हुए हैं, उनके सात चिन्तात्मक लोक हैं जो संसार के हित की कामना करने के लिए हैं। स्वर्गतो यो भवेद्वातस्तदूर्ध्वं सप्तमालिकाः । एकैकास्तेजोरूपाढ्याः स्वर्ग ? ( सूर्य ) कोटिसमुद्भवाः ( समप्रभाः ) ॥ ९ ॥ इन स्वर्गों के ऊपर भी सात मालिकाएँ हैं जिनमें एक से एक बढ़कर तेजोमय हैं और करोड़ों सूर्यों की प्रभा से युक्त हैं। प्रथमा काञ्चनसमा ह्यान्या स्फटिकनिर्मला । तृतीया त्विन्द्रनीला च वैडूर्य्या च चतुर्थिका ॥ १० ॥ पञ्चमी पद्मरागा च षष्ठी वै वज्रका मता। सप्तमी सर्वरत्नाढ्या ब्रह्मातेजस्तदूर्ध्वके ॥ ११ ॥ इनमें पहली मालिका स्वर्ग की-सी चमक से युक्त है। दूसरी स्फटिक जैसी निर्मल है। तीसरी इन्द्रनीलमणि के समान कान्तिवाली है। चौथी वैदूर्यमणि के समान, पाँचवीं पद्मरागमणि के समान, छठी हीरे के समान और सातवीं समस्त रत्नों की चमक से युक्त है। इनसे ऊपर ब्रह्मतेज है।