अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें28 अपराजितपृच्छा शम्भोर्मनोभवा रम्या परब्रह्मात्मचेतसः । तदुद्भवा ततः सृष्टिः पञ्चतत्त्वयुता परम् ॥ 19 ॥ शम्भू की मानसी सुन्दर रचना में परब्रह्मचित्त उत्पन्न हुआ। उससे ही यह परम पञ्चतत्त्वों से युक्त सृष्टि उत्पन्न हुई। हरचित्तोद्भवाद् भव्यो ? नाम ? ( भव्यस्तथा ) विश्वाधिपो हरिः । ततस्तदुद्भवा सृष्टिस्त्रैलोक्ये सचराचरे ॥ 20 ॥ हर-शिव के चित्त से ही विश्व के स्वामी हरि-विष्णु उत्पन्न हुए। इसके ही पश्चात् इनसे ही चराचरयुक्त यह त्रैलोक्य सृष्टि हुई। तदुद्भवं रजः सत्त्वं तमश्चापि तृतीयकम् । तत्र सृष्टिरनेकाऽभूज्जनसन्तानकारिणी ॥ 21 ॥ इससे ही सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी रचना हुई जिससे अनेक जीवों की सन्तानकारिणी अनेकों सृष्टियाँ उत्पन्न हुईं। रजो ब्रह्मा तमो विष्णुः सत्त्वं चैव महेश्वरः । ते चक्रयोद्भवं सत्त्वं सृष्टिसंसारसम्भवम् ॥ 22 ॥ रजोगुण से ब्रह्मा, तमोगुण से विष्णु और सतोगुण से महेश्वर उत्पन्न हुए। इन तीनों के चक्र से ही सत्व रूपा यह सांसारिक सृष्टि सम्भव हुई है। रजसो रचना ख्यातिः संसारसृष्टिकोद्भवा । चतुरशीतिलक्षाणि जीवयोनिरनेकंशः ॥ 23 ॥ रजोगुण से रचना विख्यात है जिससे यह संसार रूपी सृष्टि हुई। इसमें चौरासी लाख संख्या में विविध योनियों के जीवों की सृष्टि अनेकों प्रकार की हुई। तमसस्तामसी शक्तिस्तमसा तेजोवर्द्धिनी । माया मोहमयी कामं वैष्णवी मोहनाशिनी ॥ 24 ॥ तमोगुण से तामसी शक्ति उत्पन्न हुई और तमस से तेज को बढ़ाने वाली मोहमयी माया उत्पन्न हुई जिससे कामनाएँ बढ़ती हैं और तेज तमस से ही वैष्णवी शक्ति उत्पन्न होती है जो मोह का नाश करने में सक्षम है। सत्त्वशान्तिकशक्तिश्च सत्यज्ञानाद्ब्रह्मात्मजा । संसारपापमुक्तानां मोक्षार्थ सत्त्वशान्तिकी ॥ 25 ॥ सत्वगुण से शान्तगुण वाली शक्ति का उद्भव हुआ और सत्व की ज्ञान और ब्रह्म को उत्पन्न करने व संसार के पापों से मुक्त हुए जीवों को मोक्ष प्राप्ति के लिए