अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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किया— अपराजितपृच्छा के सूत्र सर्वत्र यह संकेत करते चलते हैं। सोलंकी ही नहीं, गुहिल कला के विकास में इस ग्रन्थ का बड़ा योगदान रहा। गुहिल राजाओं के शिल्पी तो प्रायः इसी ग्रन्थ के निर्देशों के अनुसरणकर्ता रहे। महाराणा कुम्भा के शिल्पी मण्डन के रचनाकर्म पर इस ग्रन्थ का सर्वत्र प्रभाव परिलक्षित होता है। इस ग्रन्थ के प्रारम्भिक अंशों को प्रकाश में लाने का कार्य 'बृहच्छिल्पशास्त्र' के प्रणेता जगन्नाथ अम्बाराम सोमपुरा, वढवाण ने 1933 ई. में किया किन्तु, श्लोक प्रायः अशुद्ध थे। इसे समग्रतः प्रकाशित करने का श्रेय गायकवाड़ ओरियण्टल इंस्टिट्यूट, बडोदरा को जाता है। 1950 ई. में जूनागढ़ रियासत के अभियन्ता श्रीमान् पोपटभाई अम्बाशंकर मंकड़ ने दो पाण्डुलिपियों के आधार पर इसका पाठ तैयार किया। श्री मंकड़ जोधपुर-मारवाड़ में मुख्य अभियन्ता रहे और हैदराबाद में मुख्याधिकारी रहे थे। उन्हें सिविल अभियान्त्रिकी का अच्छा अनुभव था। उन्होंने बहुत धैर्य और परिश्रम के साथ इसका पाठ तैयार किया और विस्तृत भूमिका लिखी किन्तु इसके कुछ ही स्थलों को स्पष्ट कर पाए, इसका अनुवाद नहीं हुआ। इस दिशा में कोई प्रयास भी कहीं नहीं हुआ, हाँ कुछ विद्वानों ने इस पर शोधपत्र अवश्य लिखे और प्रो. लालमणि दुबे ने इसका आलोचनात्मक अध्ययन किया; विगत साठ वर्षों से विद्वज्जगत को इस ग्रन्थ के अनुवाद की प्रतीक्षा रही है। यह विडम्बना ही कही जाएगी कि भारत के अधिकांश तकनीकी ग्रन्थ प्रकाशन के बाद अनूदित नहीं हुए। ऐसा क्यों ? एक दिन यह प्रश्न मैंने उदयपुर के शिल्पी परिवार में जाये-जन्मे आदरणीय प्रोफेसर श्री भँवरलालजी शर्मा से इस रूप में किया कि कई लोगों के पास प्राचीन वैज्ञानिक, तकनीकी ग्रन्थ हैं किन्तु अर्थ क्यों नहीं करते ? उन्होंने सहजता से कहा कि प्रथमतः इसकी शब्दावली का लुप्त होना है और फिर यह भी कटु सच है कि ऐसे ग्रन्थों का मिलना और अपने पास होना तो गौरवस्पद समझा जाता है किन्तु अध्येता को नहीं देने की मानसिकता ने इन ग्रन्थों को ताक में ही सजाये रखा; पुस्तकालयों से ऐसे ग्रन्थ सबसे पहले गायब हुए और यहाँ तक भी हुआ कि भाई ने भाई तक को अपने ऐसे ग्रन्थ नहीं दिखाए, भले ही उन्हें बाद में दीमक ने अपना आहार बना डाला... । इसी विचार ने हम दोनों को उद्विग्न कर दिया और संकल्प किया कि हमें ऐसे तकनीकी ग्रन्थों का अनुवाद करना चाहिए। मैं सूत्रधार मण्डन, चक्रपाणि मिश्र, सूत्रधार नाथा, सूत्रधार गोविन्द, बहुरी महाराणा आदि के कोई डेढ़ दर्जन ग्रन्थों पर कार्य कर चुका था किन्तु अपराजितपृच्छा को देखकर ही भय लगता था कि इतना बड़ा ग्रन्थ कैसे अनूदित होगा किन्तु बहुत सुनियोजित रूप से इसका अर्थ हुआ,