अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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नहीं, सामन्तों और सर्वसामान्य द्वारा भी ससम्मान निमन्त्रित किया जाने लगा और ये शिल्पी अपने साथ अपनी कलाओं को ले गए। इसलिए पश्चिमी भारत में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में 10वीं सदी तक की अनेक निर्मितियों में अद्भुत एकता का दर्शन होता है। विक्रम की पहली सदी पूर्व सम्पादित माने जाने वाले भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनेक स्थलों के गहन अवगाहन के आधार पर यह प्रतीत होता है कि जिन दिनों रत्न-धातु आदि के व्यापारियों और विक्रेताओं के लिए अगस्तिमत जैसे ग्रन्थ सम्मान्य थे, तब ही विश्वकर्मा का कोई विशाल ग्रन्थ अस्तित्व में आ चुका था और उनमें जनोपयोगी समस्त शिल्प सामग्रियों के संयोजन से लेकर निर्माण और न्यास तक की विधियों को विस्तार से वर्णन था। भरताचार्य ने उसी आधार पर नाट्यशाला सहित वास्तुकर्म की विधि को उद्धृत किया, इन्द्रध्वज सहित रत्नाभूषणों, आयुधों का निर्माण-निरूपण को अङ्गीकार किया। यह निश्चित ही पश्चिमी भारत में रचा गया था क्योंकि जितने प्रकार के भूरूपों भाषाओं, भूवासी-जातियों की भूषाओं का उसमें प्राथमिकताओं के साथ वर्णन है, वह विविधता इस क्षेत्र में प्रथमतया विद्यमान रही है। इसी आधार पर मैंने 'वास्तुतन्त्र' जिसे बाद में विश्वकर्मप्रकाश नाम दिया गया, के आद्यरूप की रचना इसी क्षेत्र में होना स्वीकारा है, गर्गसंहिता के वास्तु विषयक अध्याय और उसी आधार पर रचित 'बृहत्संहिता', 'विष्णुधर्मोत्तरपुराण', 'मत्स्यपुराण' इत्यादि भी इस विचार का पोषण करने वाले हैं। इसी क्षेत्र में 'जयपृच्छा' का प्रणयन हुआ जिसके विस्तृत रूप में 'प्रतिष्ठालक्षणसारसमुच्चय' और 'समराङ्गणसूत्रधार' का सम्पादन हुआ और इसी विषय-वस्तु के आश्रय में 12वीं सदी में अपराजितपृच्छा का प्रणयन हुआ। यह ग्रन्थ मूलतः भारतीय शिल्पियों के उस सोच और सङ्कल्प का सजीव साक्ष्य है जबकि सोमनाथ मंदिर पर हमला हो चुका था और पश्चिम से लेकर सिन्धु-सागर सङ्गम तक के प्रदेश के अनेक शिल्पधाम आक्रान्ताओं की चपेट में आ चुके थे। मानवीय क्रूरता ही नहीं, अकाल जैसी प्राकृतिक त्रासदियों से भी तत्कालीन भारत के अनेक प्रदेश आहत हो रहे थे, नगरों की स्थिति भयावह थी अथवा पतनोन्मुखी हो चुकी थी, ऐसे में जल संरक्षण, जीर्णोद्धार जैसी आवश्यकताओं के साथ ही आस्थाओं के केन्द्र-स्थलों के शिलान्यास सहित विविध देव स्वरूपों की प्रतिष्ठा सुखद हो सकती थी। गुरु-शिष्य जैसे सम्बन्धों की स्थापना और संहार के देवता शिव का सहायक स्वरूप अभीष्ट था। शिल्पियों ने भारतीय ज्ञान-सम्पदा सहित कला के प्रत्येक स्वरूप को संरक्षित करने का सङ्कल्प