भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 6, कुल 535 में से

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उपोद्घात कला किसी भी सभ्यता और संस्कृति की जीवन्त साक्ष्य होती है। मानवीय मन्तव्य और मनन के मूर्त-स्वरूप के रूप में कला ही किसी क्षेत्र की विरासत और थाती को स्वर देती प्रतीत होती है। कलारूपों ने ही किसी भूखण्ड और उसके कालखण्ड के मानकीकरण का आदर्श प्रस्तुत किया है। ज्यों-ज्यों कला में निखार आता गया, वह आदिम राहों से निकलकर लोक की पगडण्डी पर अग्रसर होती हुई अभिजननीय शास्त्रोचित राजमार्ग के निर्देशक-स्तम्भ के रूप में सम्मान प्राप्त करती चली गई। इस प्रकार हम कल्पनाओं की प्रसूती से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की यात्रा का अवलोकन करते आए हैं। देववाद के विकास के साथ ही कलाओं के प्रवर्त्तनकर्ता के रूप में शिल्पदेव विश्वकर्मा का आविर्भाव कुछ ऐसे ही सोपानों से होकर सम्मान के सिंहासन तक पहुँचा है। वेदों में यह कामना की गई है कि हम सुखकर, रमणीय और ऐश्वर्ययुक्त स्थान प्राप्त करें। हमारी प्राप्तियाँ और प्राप्त होने वाले श्रेष्ठ धन-वैभव का आप रक्षण करें। हमें सदैव कल्याणकारी साधनों- उपस्करों से सुरक्षित रखें : वास्तोष्पते शग्मया संसदा ते सक्षीमहि रण्वया गातुमत्या। पाहि क्षेम उत योगे वरं नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः॥ (ऋग्वेद 7, 54, 3) वैदिक काल में यद्यपि इस मान्यता के बीजों को देखा जा सकता है किन्तु उत्तरवैदिक काल में स्पष्टतः शिल्प के देवता के रूप में विश्वकर्मा सुस्थापित हुए हैं। यद्यपि कई विद्वानों ने दो-तीन विश्वकर्माओं की मान्यताओं का विचार भी दिया है किन्तु इसमें दो मत नहीं हो सकते हैं कि कलाओं के रूपों में ज्यों-ज्यों विकास हुआ, विश्वकर्मा की परम्परा को बल मिला और एक अजस्र धारा के रूप में यत्र- तत्र ही नहीं, सर्वत्र उनकी उपस्थिति को स्वीकारा गया। पुराणों में सर्वत्र ईश्वरीय रचनाओं के लिए विश्वकर्मा का स्मरण किया गया है, चाहे वह सूर्य को उचित स्वरूप देने का ही विचार क्यों न हो। प्रभासपुत्र के रूप में विश्वकर्मा की मत्स्यपुराणोक्त विचारधारा के मूल में ऐसा जान पड़ता है कि धातु-रत्नादि के व्यापार के लिए आने-जाने वालों ने प्रभास-सौराष्ट्र ही नहीं, मेवाड़ क्षेत्र को भी बहुत प्रतिष्ठा और समृद्धि प्रदान की और वहाँ जिस शिल्पी समुदाय की उन्नति हुई, वह विश्वकर्मा की परम्परा का पोषणकर्ता सिद्ध हुआ। यह परम्परा मौर्यकाल से ही देखने में आती है क्योंकि तब थल ही नहीं, जल स्थापत्य तक का वहाँ विकास हो चुका था। ज्यों-ज्यों इस समुदाय का महत्व बढ़ा, वह अनेक क्षेत्रों में शासकों ही

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