अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
पृष्ठ 80, कुल 535 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-६ देवानामाङ्गिराणां च मातृणां च तथापरम्। दैत्यादिषु च सर्वेषु पूजिताश्च तदन्वये ॥ 12 ॥ देवों में अङ्गिरागणों में एवं उनके बाद मातृगणों में, दैत्यों आदि के भी सभी वंश पूज्य है। असुरो दानवो दैत्यः शुक्नो राहुश्च पञ्चमः। गन्धर्व्याश्चैव चत्वारस्तौर्यत्रिकप्रकाशकाः ॥ 13 ॥ असुर, दानव, दैत्य तथा शुक्र और पाँचवाँ राहु गन्धर्वों के चार-चार त्रिक् प्रकाशकों के हैं। कुबेरः कङ्कतो यक्षो यक्ष्या जातास्त्रयः₃ किल। समस्ता दैत्यपालानां दैत्या भक्तवशानुगाः ॥ 14 ॥ तुम्बुरुर्नारदश्चैव नटेशः कात्यकोद्भवः। आसुर्याश्च समुत्पन्नाः पञ्चैते₅ सुरसम्भ्रमाः ॥ 15 ॥ कुबेर, कङ्कत, यक्ष ये तीनों सभी यक्ष्या से उत्पन्न हुए तथा सभी दैत्यपालगण दैत्या के भक्त व अनुचर हैं। तुम्बरु, नारद और नटेश कात्यका से उत्पन्न हुए। आसुर्या से ये पाँचों देवों को भ्रमित करने वाले उत्पन्न हुए। मन्मथः पौरुषं लोभो मोहः क्रोधश्च पञ्चमः। विद्याधरीसमुत्पन्नाः पञ्चैते वीरविक्रमाः ॥ 16 ॥ भैरवः क्षेत्रपालश्च गणो वै दूतसम्भवः। वैदेवीजाश्च चत्वारः सदा पूज्याश्च मानुषैः ॥ 17 ॥ मन्मथ या कामदेव, पौरुष-कटुवचन, लोभ, मोह और पाँचवाँ क्रोध तथा विद्याधरी से पाँच वीर विक्रम उत्पन्न हुए। भैरव, क्षेत्रपाल व गण दूत से उत्पन्न हुए और वैदेवी से उत्पन्न होने वाले चारों सदा मनुष्यों के द्वारा पूज्य माने जाते हैं। उत्पन्ना नागराजेन्द्रया वासुक्याद्या उरङ्गमाः( विहङ्गाः पन्नगास्तथा ) । वासुकी पन्नगः प्रोक्तो विहङ्गा विनतात्मजाः ॥ 18 ॥ नागराजेन्द्री से वासुकी आदि सर्प और पक्षिगण और नाग उत्पन्न हुए। वासुकी नाग को गरुड़ादि पक्षियों को विनता से उत्पन्न कहा गया है। नरेन्द्रीभ्यः समुत्पन्ना विख्याता वै नरोत्तमाः। तदनुक्रमयुक्ती च कथयामि समासतः ॥ 19 ॥ अब नरेन्द्री से उत्पन्न होने वाले विख्यात नरोत्तमों के बारे में समास रूप से अनुक्रमपूर्वक कहता हूँ।