अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें32 अपराजितपृच्छा विप्रक्षत्रियवैश्यशूद्राणां गोत्रसंख्याः - प्रथमो ब्राह्मणो जातः क्षत्रियस्तु द्वितीयकः । वैश्यो जातस्तृतीयो वै शूद्रश्चैव चतुर्थकः ॥ 20 ॥ अष्टाशीति सहस्राणि विप्रगोत्राणि वै विदुः । षट्त्रिंशच्च क्षत्रियाणां कुलीनानां तथैव च ॥ 21 ॥ चतुर्विंशति वैश्यानां शूद्राणां नैकधा तथा। पहले ब्राह्मण, दूसरे क्षत्रिय, तीसरे वैश्य और चौथे शूद्र उत्पन्न हुए। विद्वानों ने अस्सी हजार गोत्र ब्राह्मणों के माने हैं। क्षत्रियों के छत्तीस हजार और वैसे ही कुलीनों के कहे गए हैं। वैश्यों के चौबीस हजार और शूद्रों के तो अनेक प्रकार के गोत्र माने गए हैं। एते वंशाः समाख्याता यथाकल्पं भवन्ति ते ॥ 22 ॥ कल्पान्ते च विशीर्यन्ते ?( विनश्यन्ति ) सर्वे रूपसमुद्भवाः । समुद्भवन्ति ते सर्वे कल्पादौ च पुनः पुनः ॥ 23 ॥ इस तरह ये इतने अपने-अपने कर्म के अनुसार कल्पित वंश हुए जो विख्यात हैं। ये सभी कल्प के अन्त में नाश को प्राप्त होंगे और सभी नाम रूप मिट जाएँगे। इसी प्रकार ये सब कल्प के आरम्भावसर पर बारम्बार उद्भव को प्राप्त होते रहते हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छा- यामष्टशक्त्युद्भवाधिकारो नाम षष्ठं सूत्रम् ॥ 6 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में अष्ट शक्ति उद्भव अधिकार नामक छठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 6 ॥ सृष्टिसंसारावतारणं सप्तमं सूत्रम् ॥ 7 ॥ अपराजित उवाच - मूर्धजास्तृणधान्यानि वृक्षाश्चैवमनेकधाः । तदुत्पत्तिः कथं नाम( थ ) पशुपक्षिशरीरिणाम् ॥ 1 ॥ कृमिकीटपतङ्गाश्च ये च जीवानुरूपकाः । कथयस्व प्रसादेन संसारे सृष्टिसम्भवः ॥ 2 ॥ अपराजित ने पूछा- तृण और धान्यों में मुख्य-मुख्य तथा वृक्षों के भी अनेक प्रकार और पशु-पक्षी शरीरधारी जीवों की उत्पत्ति कैसे हुई? हे नाथ! यह कहें।