भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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सूत्र-७ 33 इसी तरह कृमि, कीट-पतङ्गादि जो ये जीव अनुरूप संसार की सृष्टि में उत्पन्न हुए हैं, उनके बारे में भी आप कृपा करके अवश्य कहें। विश्वकर्मोवाच - काश्यपस्य हृदुत्पन्ना मानस्यः पञ्च कन्यकाः । तदुत्पन्ना च या सृष्टिः कथये तां च साम्प्रतम् ॥ ३॥ अश्वी गजी नखी चैव शृङ्गी शुकी तु पञ्चमी । पृथगेकैकसम्भूतिं कथयामि यथाश्रुतम् ॥ ४॥ विश्वकर्मा बोले - कश्यप मुनि के हृदय से पाँच मानसी कन्याएँ उत्पन्न हुईं जिनके द्वारा जो सृष्टि उत्पन्न हुई, उसके बारे में अब मैं तुम्हें कहता हूँ। इनमें अश्वी, गजी, नखी, शृङ्गी तथा शुकी पाँचवीं कन्या है। इसमें से प्रत्येक के पृथक-पृथक जीव जैसे उत्पन्न हुए, उनके विषय में जैसा मैंने सुना, उन्हें यथावत कहता हूँ। वृक्षा श्चैवाम्बुकी जाता आम्बुकाः पञ्चमूर्धजाः । अम्बो जम्बूस्तथाऽश्वत्थो वटश्चोदुम्बरस्तथा ॥ ५॥ इसी प्रकार आम्बुकी से वृक्षों में पाँच मुख्य-मुख्य अम्बुक उत्पन्न हुए जो इस प्रकार हैं- (1.) आम, (3.) जामुन, (3.) अश्वत्थ, (4.) वट और (5.) उदुम्बर। आम्बकात् सरलोजास्तस्तस्यैव सप्तपुत्रिकाः । ताली चैव तदुद्भूताः तमालतालवृक्षकाः ॥ ६॥ धान्यकी च तृणी चैव व्याख्याताः सप्तपुत्रिकाः । शाली च व्यन्तरी चैव लता चैवौषधिस्तथा ॥ ७॥ आम्बका से सरल उत्पन्न हुआ जिसके सात पुत्रियाँ हुईं। ताली और उससे उत्पन्न हुए तमाल और ताल वृक्ष, धान्यकी, तृणी, शाली, व्यन्तरी, लता और

  • औषधि। व्यन्तार्याश्च समुद्भूता व्यन्तराश्चैव "मूर्धजाः"?। लताश्चैव लतोद्भूताः शैलाद्यं भूतले यथा ॥ ८॥ औषध्यश्चौषधीजाता लक्षाणि वै समुद्भवाः । धान्यकी धान्यसम्भूतिः सङ्ख्याताष्टादशात्मिका₁₈ ॥ ९॥ व्यन्तरी से मुख्य-मुख्य व्यन्तरा वृक्ष उत्पन्न हुए। इसी तरह लता से भी भूतल पर लता से उत्पन्न होने वाले शैलाद्य उत्पन्न हुए। औषधि से उत्पन्न लाखों औषधियाँ पैदा हुईं। धान्यकी से भी अठारह प्रकार की संख्या के धान्य उत्पन्न हुए।