अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र-७ 35 अश्व, खर, पौर, गैर (गवय), मर्कट आदि अन्य श्वापद सभी अश्व से ही हुई उत्पत्ति में कहे गए हैं। तिस्रः पुत्र्यः समुत्पन्ना मानस्यः कश्यपस्य तु। पद्मा चाम्भोभवी क्रौञ्चा तिस्रश्चैवं प्रकीर्तिताः ॥ 18 ॥ कश्यप से तिस्र पुत्रियों से उत्पन्न होने वाले मानस्य और पानी से पैदा होने वाले पद्म, क्रौञ्च ये तिस्र ही कहे गए हैं। अम्भोभव्या जलचराः पद्मायाः पद्मसम्भवः। क्रौञ्चात्मजाश्च शैवालास्त्रिधा चैवं समुद्भवम् ॥ 19 ॥ अम्भोभव्या- पानी में उत्पन्न होने वाले सभी जलचर और पद्म-कमल तथा कमल से उत्पन्न होने वाले, क्रौञ्च-सारस और तीन प्रकार के शैवाल जो पानी में उत्पन्न होते हैं। चतुर्वर्णाः प्रकृतयो ह्यन्त्यजा नीचकोद्भवाः। भौमाः कीटपतङ्गाश्चोष्मजा उरगव्यन्तराः ॥ 20 ॥ भूम्युदकेषु सम्भूता विख्याता बीजतस्तथा। भूमौ समुद्भवं चैवं सम्योगे वारिणां खलु ॥ 21 ॥ चारों वर्णों की प्रकृति प्रजा व निम्न योनि में जन्म लेने वाले अन्त्यज, भूमि में पैदा होने वाले कीट-पतङ्ग जो गर्मी से उत्पन्न होते हैं तथा उरग-सर्पादि व्यन्तर जीव, भूमि और पानी से उत्पन्न होने वाले विख्यात बीज जो भूमि में पानी के संयोग से सभी उत्पन्न होते हैं। उदके सर्वबीजानां सम्भूतिः सर्वतः स्मृता। केचिदाकाश उत्पन्नाः केचित्पातालसम्भवाः ॥ 22 ॥ केचिद्द्भूम्युद्बवाश्चैव त्रिविधः₃ सृष्टिसम्भवः। वर्षाकाले समुत्पत्तिर्हेमन्ते तु प्रवर्तनम् ॥ 23 ॥ प्रलयो ग्रीष्मसम्प्राप्तौ अजीर्णे ? पुनराव्रजेत्। चतुरशीति₈₄ लक्षाणि जीवयोनिरनेकधा ॥ 24 ॥ जल से ही समस्त बीजों की उपज-निपज होती है, ऐसा सभी को ज्ञान है। कितनी ही आकाश में उत्पन्न होने वाली तथा कितनी ही पाताल में उत्पन्न होने वाली, कितनी ही भूमि में उत्पन्न होने वाली ऐसी तीन प्रकार की सृष्टि सम्भव होती है जो वर्षाकाल में उत्पन्न होकर हेमन्त ऋतु में प्रवर्तित होती है जबकि ग्रीष्मकाल के आने पर सूख जाती है परन्तु नष्टभूत नहीं होती और पुनः उत्पन्न हो सकती है।