भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 535 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 85

36 अपराजितपृच्छा इस प्रकार चौरासी लाख योनियाँ¹ हैं जो नाना प्रकार की होती है। इति सूत्रसन्तागुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां- सृष्टिसंसारावतारणाधिकारो नाम सप्तमं सूत्रम् ॥ 7 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सृष्टि संसार अवतारण अधिकार नामक सातवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 7 ॥ सप्तपातालराज्योद्भवो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ 8 ॥ अपराजित उवाच - के च स्वर्गे कृता देवा के च पातालसम्भवाः । मर्त्यलोके च भूतानि कथयस्व परेश्वर ॥ 1 ॥ अपराजित बोले - स्वर्ग के कौन-कौन देवता है और पाताल में होने वाले देव कौन-कौन हैं, इसी प्रकार हे परमेश्वर ! आप मुझे मर्त्यलोक में होने वाले प्राणियों के बारे में भी उपदेश कीजिए। विश्वकर्मोवाच - तलो वितलस्सुतलो नितलश्च तलातलः । रसातलश्च पाताल उरगेशाश्च सप्त च ॥ 2 ॥ उरगोद्भवपाताले सप्तपातालविक्रमम् । पृथगेवं समुद्दिष्टा ? नवनागकुलानि च ॥ 3 ॥ विश्वकर्मा बोले - तल, वितल, सुतल, नितल, तलातल, रसातल व पाताल- ये सात सर्पराजाओं के, उरगेशों के लोक हैं। इन उरगों-सर्पों के पातालों में सातों पाताल बड़े ऐश्वर्यवाले है। इनसे अलग नौ नागकुलों को बताया गया है। नवकुलनागराजनामावली - पद्मः कर्कोटकश्चैव पुण्डरीकोऽथ तक्षकः ।

  1. गरुडपुराण में आया है- चतुरशीतिलक्षाणि चतुर्भेदाश्च जन्तवः । अण्डजाः स्वेदजाश्चैव उद्भिजाश्च जरायुजाः ॥ एकविंशति लक्षाणि ह्यण्डजाः परिकीर्तिताः । स्वेदजाश्च तथैवोक्ता उद्भिजास्तत् प्रमाणतः ॥ जरायुजाश्च तावन्तो मनुष्याद्याश्च जन्तवः । सर्वेषामेव जन्तूनां मनुषत्वं सुदुर्लभम्। (प्रेतकल्पोक्त धर्मप्रकटन नामक द्वितीय अध्याय) बृहद्विष्णुपुराणे - जलजा नवलक्षाणि स्थावरा लक्षविंशतिः । कृमयो रुद्रसङ्ख्याकाः पक्षिणां दशलक्षकम् ॥ त्रिंशल्लक्षाणि पशवश्चतुर्लक्षाणि मानुषां । सर्वयोनिं परित्यज्य ब्रह्मयोनिं ततोऽभ्यगात् ॥ (शब्दकल्पद्रुम चतुर्थ