भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

सूत्र-८ 37 अनन्तः शङ्खचूडश्च वासुकिः सप्तमो मतः ॥ ४ ॥ सप्तपाताललोकेशो महावीर्या मदोत्कटाः । रौद्राश्च विद्रुताः सर्वे ह्यमात्या वीरविक्रमाः ॥ ५ ॥ ये नौकुली नाग हैं- (1.) पद्म, (2.) कर्कोटक, (3.) पुण्डरीक, (4.) तक्षक, (5.) अनन्त, (6.) शङ्खचूड़, (7.) वासुकी। ये सभी सप्त पातालों के बड़े बलवान, मदोन्मत्त अधिपति, लोकेश हैं। ये बड़े भयङ्कर रौद्ररूप व शीघ्रगामी तथा सभी आमात्य वीर और पराक्रमी होते हैं। तलेषु पद्मकॊ राजा वितले च कर्कोटकः । सुतले पुण्डरीकाक्षो नितले चैव तक्षकः ॥ ६ ॥ तलातले त्वनन्तश्च शङ्खचूडो रसातल । वासुकिर्नागराजेन्द्रः पाताले सर्वतोऽधिपः ॥ ७ ॥ इनमें से तल नामक पाताल के राजा पद्मक हैं, वितल के कर्कोटक, सुतल के पुण्डरीकाक्ष और नितल के राजा तक्षक है। तलातल के राजा अनन्त, रसातल के शङ्खचूड़ और इन सब पर वासुकी नागराजेन्द्र समस्त पातालों के महाराजा है। कुलानि नव₉ प्रत्येकं त्रिषष्टि₆₃ कुलपन्नगाः । सप्त₇ पाताललोकेशोः संस्थिताः क्रमयोगतः ॥ ८ ॥ इन सातों में प्रत्येक के नौ-नौ कुल है और इस प्रकार ये सभी सात गुणा नौ मिलाकर कुल तिरसठ प्रकार के नाग उक्त सातों पातालों के लोकेश के रूप में क्रमशः संस्थित हैं। पद्मेशराज्यवासिनामाह — यत्पद्मेशस्य वै राज्यमाद्यपातालसञ्जितम् । तत्रामर्त्यनिवासाश्च चन्द्रकान्तिसमा भुवः ॥ ९ ॥ दिव्यरूपधराः सर्वे दिव्याभरणभूषिताः । स्वेच्छारूपं स्त्रीनराणां स्वेच्छागम्यास्तदात्मजाः ॥ १० ॥ जो पद्मेश नाग का राज्य है, उसे आदिपाताल नाम से कहा गया है। वहाँ के रहने वाले मर्त्य लोग चन्द्रकान्ति वाले अर्थात् गौरवर्ण होते हैं। वे सभी दिव्य कान्ति वाले रूपयुक्त और दिव्य वस्त्राभरणों को धारण किए सुशोभित होते हैं। इन सब की यह विशेषता भी है कि ये सब नर-नारी अपनी इच्छा के अनुसार रूप धारण करने वाले (इच्छाधारी) होते हैं और उनकी सन्तानें भी मनैच्छित ढंग से, स्वच्छन्द रूप से कहीं भी आ-जा सकती हैं अर्थात निरङ्कुश हैं।