अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें38 अपराजितपृच्छा रक्तोष्ठी कम्बुग्रीवा च कर्णपूरायतेक्षणा। वर्णश्यामा क्षाममध्या दशनैर्मौक्तिकोपमा ॥ 11 ॥ नीलोत्पलदलाभासा करवीरदलाकृतिः। सारद्रुमनितम्बा च रम्भाजङ्घा तथैव च ॥ 12 ॥ इनकी सन्तानों की विहारचर्या देखने योग्य है। ये ओठों को रक्तवर्ण से रङ्गे रखते हैं। इनकी गर्दन शङ्ख के समान सुडौल भरी हुई होती है और इनके विशाल नेत्रों की लम्बाई कानों तक पहुँचती भौंहों से युक्त होती है। इनका वर्ण साँवला होता है और इनकी कमर का मध्य प्रदेश बहुत क्षाम अर्थात् पतला होता है। इनकी दन्तपङ्क्तियाँ मोती की भाँति चमकदार होती है। इनका शरीर नीलकमल की पँखड़ियों जैसा सौन्दर्याभास देता है। इनका मांसल शरीर करवीर की पँखड़ियों जैसी भरी हुई आकृति वाला होता है। इनमें नवाङ्गना सुन्दरियों के नितम्ब भरे हुए पुष्ट, सुडौल सारद्रुम की भाँति मोटाई लिए हुए गोल होते हैं और इन सुन्दरियों की जङ्घाएँ बड़ी सुडौल भरी हुई केले के तने जैसी पुष्ट होती है। एवं स्त्रियः पुमांसश्च स्वेच्छारूपधराः किल। पद्मोशस्य महाराज्यं पूर्वं पातालवासिनाम् ॥ 13 ॥ इस प्रकार इन नाग लोकों के समस्त स्त्री-पुरुष स्वेच्छा रूप धारण किए हुए, मनमाने ढंग से पद्मेश के राज्य के पहले के पातालवासी होते हैं। कर्कोटकराज्यवासिनामाह — दिव्यतेजोमयाश्चैवं शुद्धस्फटिककान्तयः। तथा वायतनेत्राश्च प्रवालसदृशाधराः ॥ 14 ॥ केतकीदलसारूपप्या करदग्रेन शोण्यता ?। श्वेताः स्त्रियश्च पुरुषाः ख्याता वितलवासिनः ॥ 15 ॥ ताम्बूलादिरसाहाराः शत्रुरूपा महाबलाः। एवं कार्कोटकं राज्यं पाताले तु द्वितीयके ॥ 16 ॥ दिव्य तेजयुक्त आभा वाले और शुद्ध स्फटिक के समान उज्ज्वल और पारदर्शी स्वभाव के और विशाल नेत्र व मूंगा जैसे लाल-लाल रङ्गों से रङ्गे ओष्ठ, अधर वाले केतकी के फूलों की पँखड़ियों के समान कोमल हाथों की शोण्यता युक्त सुन्दरता लिए हुए ये विख्यात वितलवासी नर-नारीगण गौर वर्ण के होते हैं। इस तरह के ये द्वितीय पातालवासी कर्कोटक के राज्य वाले ताम्बूलादि रसों के आहारी शत्रुओं के लिए महा बलवान् सिद्ध होने वाले लोग हैं।