भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 535 में से

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पृष्ठ 89

दिव्यरसाहारमाला दिव्यदेहा महोत्कटाः । सांसारामोघमालिन्यस्तद्राज्ये च स्त्रियस्तथा ॥ 24 ॥ मोहिन्यो दिव्यदेहैस्तु मोहयन्ति जगद्गुरुम्। एवं गुणैः समुद्भूता आनन्ते न तलातले ॥ 25 ॥ अब मैं पाँचवें अनन्त नागराज के बारे में कहता हूँ। नीलकमल दलों के समान कान्तिवाले और अतसी पुष्पों के समान आभा वाले, मणिरत्नों से भरपूर शोभा वाले, दिव्य आभूषणों से सजे-धजे, दिव्यरसों का पान करने वाले दिव्य पुष्पहारों को धारण करने वाले, दिव्य देह युक्त ये महाबलवान उत्कट योद्धा होते हैं और वहाँ की स्त्रियाँ भी सांसारिक व्यर्थ की मलीनता से मुक्त भाव से अपनी दिव्य देह से और मोहिनी रूप से जगत के बड़े-बड़े गुणवानों को मोहित करने वाली एवं महान गुणवाली ये सन्नारियाँ अनन्त नाग के राज्य तलातल नामक पाताल की उत्तम उपज हैं। रसातलनिवासिनामाह — रसातले तु पाताले रसानां दिव्यदेहकम्। यस्तच्चारुसैर्दिव्यैर्शोभि वे दिस्य देहिनः ? ॥ 26 ॥ दिव्यपरत्नोपमाः कान्ता दिव्यदेहाः सुरूपकाः । नागकन्या महारूपाश्चूडामणिमहोत्सवाः ॥ 27 ॥ श्वेतरक्तपीतकृष्णाविचित्ररूपशोभिताः । राज्ये वै शङ्खचूडस्य नागराजेन्द्रकन्यकाः ॥ 28 ॥ रसातल नामक पाताल निवासी समस्त पृथ्‍वी (रसा) पर दिव्य गुणों (रसों) से युक्त व दिव्य शोभायुक्त देह वाले होते हैं। इनके स्वरूप की कान्ति दिव्य रत्नों के समान उपमा वाली, सुन्दर कान्ताओं, महा रूपवती महोत्सवों की चूड़ामणि रूप, सुन्दर नाग कन्याओं की गौरवणीं, रक्तवर्णी, पीतवर्णी, कृष्णवर्णी विचित्र रूपवती इन सन्नारियों से शोभित नागराजेन्द्र शङ्खचूड़ के राज्य की ये सब नाग कन्याएँ हैं। इत्यमनन्तर पातालनिवासिनामाह — सप्तमं कथयिष्यामि पातालं च यथाक्रमम्। पातालेषु च सर्वेषु श्रेष्ठं नागसमाकुलम् ॥ 29 ॥ समारूपैराकीर्णे श्वेतरक्तशरीरिभिः । पद्मरागनिभाः सन्ति सर्वरत्नैश्च शोभिताः ॥ 30 ॥ अब मैं सातवें पाताल लोक का यथाक्रम वर्णन करता हूँ जो समस्त पातालों में सर्वश्रेष्ठ नागों का समाकुल सङ्कठन है। यहाँ के नाग सभी समान रूपों से भरपूर है।