भारतकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 90, कुल 535 में से

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इनके स्वरूप गौरवर्ण, रक्तवर्ण, पद्मराग के समान वर्ण युक्त होते हैं और सभी प्रकार के रत्नों से ये शोभायमान होते हैं। मोहमुद्रापमा दृष्टिः संसारफलदोपमाः । तथा चूडोन्नताः केशाश्चित्ररत्नसमुज्ज्वलाः ॥ ३१ ॥ चन्द्रसूर्योपमैश्चैव कुण्डलैस्समलङ्कृताः । नैकरत्नमयैश्चैव हारैः पापप्रणाशनैः ॥ ३२ ॥ इनकी मोहक दृष्टि से संसार में जन्म लेने का फल सार्थक लगने लगता है। इनके सिर के केश विचित्र रत्नों से जड़े हुए चमकदार ऊँचे जूड़ों में गूँथे हुए तथा चन्द्र, सूर्य की उपमा की शोभायुक्त कर्ण कुण्डलों से अलङ्कृत और अनेक रत्नों से निर्मित हारों को धारण करने से ये समस्त पापों, बुराइयों, कमियों को समाप्त कर देने वाली हैं। मेखलाकटिसूत्राद्यैस्सर्वरत्नोपमैः सदा। एवमाभरणैर्युक्ता दिव्यकान्त्या सुतेजसा ॥ ३३ ॥ स्वर्गादिदेवताभक्ताः पन्नगास्सुमहोत्सवाः । देवाग्निगुरुभक्ताश्च संस्थिताश्चैव निश्चलाः ॥ ३४ ॥ ये सब रत्नों से भरपूर मेखला व कटिसूत्रादि से आभूषित सदा ऐसे उत्तम आभूषणों की दिव्य कान्ति और सुन्दर चमक-दमक युक्त रहकर स्वर्गादि देवताओं की भक्ति में देव, अग्नि और गुरु की भक्ति में, नागों के महोत्सवों में भाग लेती हुई नित्य निश्चल दृढ़ता के साथ संस्थित रहती हैं। सहस्रफणसङ्कीर्णाः सहस्ररदशोभिताः । स्वेच्छारूपधरा दिव्याः स्वर्गपातालगामिनः ॥ ३५ ॥ एवं वासुकिराज्यं च सप्तपातालकक्रमः । वासुकिर्नागराजेन्द्र ईश्वरानन्यभक्तिमान् ॥ ३६ ॥ ये सभी हजारों फणों से युक्त, हजारों दांतों से शोभित, मन चाहा रूप धरने में समर्थ, दिव्य सन्नारियाँ हैं और स्वर्ग से लेकर पाताल तक आवागमन करने वाली हैं। इस तरह ईश्वर की अनन्य भक्ति में लीन वासुकी नाग राजेन्द्र की वासुकी राज्य की प्रजा सप्त पातालों के क्रम में वर्णित हैं। इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां सप्तपातालराज्योद्गवाधिकारो नामाष्टमं सूत्रम् ॥ 8 ॥ इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में सप्त पाताल राज्य उद्भव अधिकार नामक आठवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 8 ॥