भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ९४ ) अपरोक्षानुभूतिः । ततः कारणात्कार्य्याभावे कारणत्वं गच्छेत् ननु कथं कारणे कार्य्याभाव इत्यतआह विचारतइति यथायं दृष्टांतस्तथाकाशादिकार्ये कारणता आकाशोस्तिभाती- त्यादिव्यवहारहेतुभूता सत्यज्ञानादिरूपब्रह्मणः कारणता आयाता अनुगता कारणे ब्रह्मणि तु आकाशादिकार्यता- नहीति अतः परमार्थतः आकाशद्यभावे ब्रह्मणः कारण- तापि नहीति दार्ष्टांतिकोऽर्थः ॥ १३५ ॥ भा. टी. कार्य्यमें कारणता रहे है परन्तु कारणमें कार्य्य- ता नहीं मालूम होय है कार्य्यका भाव होनेसे कारणता अपने आप सिद्ध होजाय है । इसी प्रकार विचार करनेसे आका शादि कार्य सम्पूर्ण अनित्य मालूम होय हैं और केवल ब्रह्म ही कारण स्वरूप सत्य मालूम होय है ॥ १३५ ॥ अथ शुद्धंभवेद्वस्तु यद्वै वाचामगोचर- म् ॥ द्रष्टव्यं मृद्घटेनैव दृष्टांतेन पुनः पुनः ॥ १३६ ॥ सं. टी. ततः किमत आह अथेति अथानन्तरं कार्य- कारणभावनिवृत्तौ यच्छुद्धं मनोवाचामगोचरं वस्तु तद्भवेत् “ यतो वाचो निवर्त्तंते ” इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धि- द्योतनार्थो हि शब्दः । ननु बुद्धेः क्षणिकत्वेनैकदा तथा विचारितेपि पुनरन्यथैव भातीत्यत आह द्रष्टव्य- मिति ॥ १३६ ॥

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