अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (९३) ना ॥ यथातिष्ठन्तिब्रह्माद्याः सनकाद्याः शुकादयः ॥ १३४ ॥ सं. टी. यत एवं तस्माद्ब्रह्मनिष्ठैर्ब्रह्मवृत्त्यैव सर्वदा स्थातव्यमिति सूचयितुं ब्रह्मादीनामुदाहरणमाह नि- मेषेति यथा ब्रह्माद्यास्तथासनकाद्याः यथा सनकाद्या- स्तथा शुकाद्या इति संप्रदायो दर्शितः एतेन ब्रह्मादिसे- व्यत्वादितिश्रेष्ठोयं समाधिपर्यंतो राजयोगः सर्वदा मुमु- क्षुभिः सेवनीय इति ध्वनितम् ॥ १३४ ॥ भा. टी. जिस प्रकार ब्रह्मादि देवगण सनकादि मुनिगण शुकादि ब्रह्मपरायण गण सर्वकालमें ब्रह्ममें लीन रहे हैं तिसी प्रकार मोक्षकी इच्छाकरने वाले पुरुष ब्रह्ममयी वृत्तिके विना अर्थात् ब्रह्मानुसन्धानके विना पलभरभी नहीं खोवे हैं अर्थात् सदा ब्रह्मवृत्तिमें तत्पर रहे हैं ॥ १३४ ॥ कार्ये कारणता याता कारणे नहिकार्य- ता ॥ कारणत्वंततोगच्छेत्कार्याभावे विचारतः ॥ १३५ ॥ सं. टी. तदेवंस्वाभिमतं सांगं राजयोगमभिधाय पूर्वोपक्रांतं सांख्यापरपर्यायं वेदांतविचारमुपसंहरति- कार्य इत्यादिपंचभिः श्लोकैः कार्येति कार्ये घटपटादि- रूपे विकारेकारणता मृत्तत्वादिरूपा सर्वविकाराधिष्ठा- नता आयाताऽनुगता कारणेतु कार्यता नहीति प्रसिद्धं