भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ९२ ) अपरोक्षानुभूतिः। भा.टी. जो ब्रह्मवृत्तिको जानतेहैं और जानकर बढ़ावें हैं वह सत्पुरुष धन्य और तीनों भुवनमें पूजनीय होयहैं ॥ १३१ ॥ येषां वृत्तिः समा वृद्धा परिपक्वा च सा पुनः॥ तैवैसद्ब्रह्मतां प्राप्ता नेतरे शब्द- वादिनः ॥ १३२ ॥ सं. टी. एवं ब्रह्मवृत्तिपरान्स्तुत्वाऽधुना तेषां ब्रह्म- प्राप्तिरूपं फलमाह येषामिति सुगमम् ॥ १३२ ॥ भा. टी. जिन पुरुषोंकी ब्रह्मवृत्ति अत्यन्त वृद्धिको प्राप्त होयहै और भलीप्रकार पकजाय है उनकोही सर्व स्वरूप ब्रह्मका लाभ होयहै और जो केवल जिह्वाही से अहं ब्रह्म अहंब्रह्म कहैं हैं उनको ब्रह्मका लाभ किसी समयभी नहीं होयहै ॥ १३२ ॥ कुशला ब्रह्मवार्त्तायां वृत्तिहीनाः सुरा- गिणः॥ तेप्यज्ञानितया नूनं पुनरायां- ति यांति च ॥ १३३ ॥ सं. टी. तानेव शब्दवादिनो निंदति कुशलाइति स्पष्टम् ॥ १३३ ॥ भा. टी. जो पुरुष ब्रह्मवृत्ति करके हीनहोय हैं और ब्रह्म- वेत्तापन प्रकाश करें हैं इसी प्रकार ब्रह्ममें, दिखावें हैं वह अज्ञान वश वारम्वार संसारमें आवागमन करें हैं ॥ १३३ ॥ निमेषार्धं न तिष्ठंति वृत्तिं ब्रह्ममयीं वि