अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)
Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 109 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (९१) उसको घटादि पदार्थोंका प्रकाश होयहै जिसके चित्तकी वृत्ति शून्यताको आश्रय करे है उसका चित्त शून्यमय होयहै इसीप्रकार जिसके चित्तकी वृत्ति चैतन्यस्वरूप ब्रह्ममें जाय है उसको पूर्ण ब्रह्मका लाभ होयहै इससे पुरुषको जिसप्र- कार पूर्ण ब्रह्मत्वका लाभ होय उसतरहका अभ्यासकर लाभ उठाना योग्यहै ॥ १२९ ॥ येहि वृत्तिं जहत्येनां ब्रह्माख्यां पावनीं पराम् ॥ तेतुवृथैवजीवंति पशुभिश्च समा नराः॥१३०॥ सं. टी. इदानीं ब्रह्ममयीं वृत्तिं स्तोतुं तद्वृत्तित्याग- परान्निंदति येहीति ये एनां ब्रह्माख्यां वृत्तिं जहाति त्यजं- ति तेतु वृथैवजीवंतीत्यन्वयः स्पष्टमन्यत् ॥ १३० ॥ भा. टी. जो पुरुष परमपवित्र और सबसे उत्कृष्ट ब्रह्म- वृत्तिका परित्याग करे हैं वह मनुष्य इस संसारमें वृथाही पशुओंकी समान जीवन धारण करे हैं ॥ १३० ॥ येहि वृत्तिं विजानंति ज्ञात्वापि वर्ध- यंति ये ॥ तेवै सत्पुरुषाधन्या वंद्यास्ते भुवनत्रये ॥ १३१॥ सं. टी. संप्रति तामेव वृत्तिं विवर्द्धयितुं ब्रह्मवृत्तिप- रान्सत्पुरुषान् स्तौति येहीति स्पष्टम् ॥ १३१ ॥