भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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( ९० ) अपरोक्षानुभूतिः । वासनया चित्तस्य स्तन्धीभावः कषायः क्षुब्धतेत्यर्थः स्पष्टमन्यत् ॥ १२८ ॥ भा. टी. समाधि साधन कालमें अनेक प्रकारके विघ्न आनके बलसे निरोध करें हैं वह विघ्न यह हैं अनुसन्धान- राहित्य अर्थात् किसीप्रकार अनुसंधान नहीं रहना, आलस भोगलालसा, लय अर्थात् निद्रा, तम अर्थात् कार्य्या- कार्यका अविवेक, विक्षेप अर्थात् विषयानुराग, रसास्वाद अ- र्थात् मैं बडा धन्यहूँ इसप्रकार आनन्दका अनुभव करना, शून्यता अर्थात् रागद्वेषादिकसे चित्तकी विकलता, इसप्रकार विघ्नोंके समूहको ब्रह्मवेत्ताओंको शनैःशनैः त्याग करना योग्यहै ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ भाववृत्त्या हि भावत्वं शून्यवृत्त्या हि शून्यता ॥ ब्रह्मवृत्त्याहिपूर्णत्वं तथा पूर्णत्वमभ्यसेत् ॥ १२९ ॥ सं. टी. :वृत्तिरेव बंधमोक्षकारणमित्याह भावेति भाववृत्त्या घटाद्याकारवृत्त्या भावत्वं तन्मयत्वं भवती- ति शेषः शून्यवृत्त्या अभाववृत्त्या शून्यता जडतेत्यर्थः हीति लोकप्रसिद्धौ तथा ब्रह्माकारवृत्त्या पूर्णत्वं हीति विद्वत्प्रसिद्धौ ततः किमतआह पूर्णत्वमिति ॥ १२९ ॥ भा. टी. जिसके चित्तकी वृत्ति घटादि भाव पदार्थोंमें जायहै