भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता ( ९७ )' सं. टी. ननु विचारजन्यापरोक्षज्ञानेन मुनेर्ब्रह्मत्वं भवतु नाम परन्तु परोक्षज्ञानिनः कथं भवेदित्याशंक्य तीव्रभावनया परोक्षज्ञानिनोपि ब्रह्मत्वं भवेदिति सह- ष्टांतमाह भावितमिति । अयम्भावः यद्यपि परोक्षज्ञानेन प्रमातृगतावरणनिवृत्तौ सत्यामपि प्रमेयगतमावरणं न निवर्त्तते तथापि निश्चयात्मना निश्चययुक्तबुद्धिमता पुरुषेण यद्वस्तु सच्चिदानंदं ब्रह्म तीव्रवेगेनाऽहर्निशं ब्रह्माकारवृत्त्याभावितं चिंतितं तद्वस्तु ज्ञेयमपरोक्षेण ज्ञातुं योग्यं ब्रह्म शीघ्रमाचिरेण पुमान् भवेत् प्रत्य- गभिन्नब्रह्मभावनया पुरुषो ब्रह्मरूपो भवतीत्यर्थः हीति विद्वत्प्रसिद्धौ । तत्र सर्वलोकप्रसिद्धं दृष्टांतमाह भ्रमर- कीटवदिति । भ्रमरेण कुतश्चिदानीय जीवन्नेव स्वकुट्यां प्रवेशितो यः कीटः स यथा भयात् भ्रमरध्यानेन भ्रम- रएव भवति तद्वदिति ॥ १४० ॥ भा. टी. निश्चयात्मा पुरुषकी तीव्रभावना करके जो मनुष्य जिस वस्तुकी चिन्ता करे है शीघ्रही भ्रमरकीटकी तरह तद्रूप होजाय है, जैसे भ्रमरकीट कीडाविशेष होयहै वह अपने स्थानमें जिस दूसरे कीडेको लाके धरे है वह लाया हुआ कीट भयके मारे भ्रमरकीटका विचार करे है विचार करते २ तद्रूप होजाय है ऐसी लोकमें प्रसिद्धि है, इसी प्रकार पुरुष ब्रह्मका विचार करता करता तद्रूप होजाय है ॥ १४० ॥ ५