भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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(१०) अपरोक्षानुभूतिः। 'उपरति' है। और संपूर्ण प्रकारके दुःखोंको सह लेना सो 'तितिक्षा' कहावे है ॥ ७ ॥ ( श्रद्धा और समाधानस्वरूप ) निगमाचार्यवाक्येषु भक्तिः श्रद्धेति विश्रुता ॥ चित्तैकाग्र्यन्तु सल्लक्ष्ये स- माधानमिति स्मृतम् ॥ ८ ॥ सं. टी. अपिच निगमेति निगमाचार्यवाक्येषु वेद- गुरुवचनेषु यद्दोपनिषद्व्याख्यात्रुपदेशेषु भक्तिर्भज- नं विश्वास इत्यर्थः सा श्रद्धेति विश्रुता वेदांतप्रसिद्धा तु पुनः सल्लक्ष्ये “ सदेव सोम्येदमग्रआसीत् ” इत्या- दिश्रुतिलक्ष्ये प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मणि चित्तैकाग्र्यं तदेक- जिज्ञासेत्यर्थः तत्समाधानमिति स्मृतम् ॥ ८ ॥ भा. टी. वेद शास्त्र पुराण और गुरुके वाक्योंमें जो भक्ति करनाहै सो 'श्रद्धा' कहावे है और शब्दादि विषयोंसें अन्तः करणको हटाकर मोक्षोपकारक श्रवण, मनन, निदिध्यासन द्वारा निरन्तर नित्य अनित्यके विचारको समाधान कहें हैं॥८॥ ( मुमुक्षुता स्वरूप ) संसारबन्धनिर्मुक्तिः कथं मे स्यात्क- दा विधे ॥ इति या सुदृढा बुद्धिर्वक्त व्या सा मुमुक्षुता ॥ ९ ॥