भारतकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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(२०) अपरोक्षानुभूतिः । भा. टी. आत्मा अन्दर स्थित है और प्रेरणा करने वाला है देह बाहर और प्रेरित है तबभी संसार बन्धनमें फँसे हुए अज्ञानी पुरुष देह और आत्मांकी समता कर व्यवहार करें- हैं इससे अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥ १८ ॥ आत्मा ज्ञानमयः पुण्यो देहो मांसम- योऽशुचिः ॥ तयोरैक्यं प्रपश्यन्तिकि- मज्ञानमतः परम् ॥ १९ ॥ सं. टी. अन्यदपि वैलक्षण्यमाह आत्मेति आत्मा ज्ञानमयः प्रकाशरूपोऽतएव पुण्यः शुद्धःदेहस्तु मांसा- दिविकारवानतएवाऽशुचिः एतेनात्मनः स्थूलदेहादपि वैलक्षण्यमुक्तं भवति तयोरैक्यमित्यादि पूर्ववत् ॥ १९ ॥ भा. टी. आत्मा ज्ञानमय है पवित्रहै और देह मांस रुधिर अस्थि चर्बी इत्यादिकोंसे बनाहुआ है इसी कारण अप- वित्र है तबभी संसार बंधनमें फँसे हुए अज्ञानी पुरुष देह और आत्माकी समताकर व्यवहार करें हैं इससे अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥ १९ ॥ आत्मा प्रकाशकःस्वच्छो देहस्तामस उच्यते ॥ तयोरैक्यं प्रपश्यन्ति किम- ज्ञानमतःपरम् ॥ २० ॥ सं. टी. वैलक्षण्यांतरमाह आत्मेति आत्मा स्वयंप्र- काशः सन् सूर्यादिवदन्यसर्वप्रकाशकोऽतएवस्वच्छः